शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

सरल स्वभाव के 'बाबू' लोकल फॉर वोकल के प्रणेता थे

 देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की विद्धता और महान शख्सियत की चर्चा देश ही नहीं विदेशों में भी होती है...आज उसी महान विभूति भारत रत्न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की जयंती है...


जीवन परिचय

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को प्यार से लोग बाबू राजेंद्र प्रसाद भी कहकर बुलाते हैं...उनका जन्म 3 दिसम्बर 1884 को सीवान के जीरादेई गांव हुआ...उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के विद्वान थे...उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं...पांच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा ग्रहण करना शुरू किया...उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए... राजेन्द्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्यकाल में ही लगभग 13 वर्ष की उम्र में  राजवंशी देवी से हो गया...विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टीके घोष अकादमी से अपनी पढ़ाई जारी रखी...


बाबू की प्रतिभा के सब थे कायल

18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी...उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था... साल 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया...उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले और बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया...1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ एलएलएम की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की...


हर भाषा के प्रेमी लेकिन हिंदी से विशेष लगा
व था

राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी...फिर भी उन्होंने बीए में उन्होंने हिंदी ही ली...वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे...गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था...हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था...हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था...हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे...


लोकल फॉर वोकल के सबसे बड़े उदाहरण

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे...वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे...उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई...उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था...राजेन्द्र बाबू महात्मा गांधी की निष्ठा, समर्पण और साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1928 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया...गांधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था...


देशसेवा सर्वोपरि, सरल स्वभाव

12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अवकाश की घोषणा की...अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार की ओर से सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया...राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा बड़ी सरल थी...उनके चेहरे मोहरे को देखकर पता ही नहीं लगता था कि वे इतने प्रतिभा सम्पन्न और उच्च व्यक्तित्ववाले सज्जन हैं... देखने में वे सामान्य किसान जैसे लगते थे...अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के सदाकत आश्रम को चुना...28 फरवरी 1963 को वे हम सबको छोड़कर चले गए...

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

वीर कुंवर सिंह जैसे योद्धा विरले ही होते हैं



 

80 साल की उम्र में  लड़ने और विजय हासिल करने के लिए अगर किसी शख्स का नाम लिया जाता है तो वो हैं वीर कुंवर सिंह...वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था....वीर कुंवर सिंह सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक थे...अन्याय विरोधी और स्वतंत्रता प्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक थे...


पारिवारिक परिचय

वीर कुंवर सिंह के पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे...उनकी माताजी का नाम पंचरत्न कुंवर था....उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह और इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह,  गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे....ये परिवार अपनी आजादी कायम रखने के खातिर सदा लड़ने के लिए जाना गया...


गजब की थी नेतृत्व क्षमता

1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया...मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे देश में विप्लव मचा दिया... बिहार की दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दी...मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी... ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकु सिंह और भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया...


27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया...अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा...जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई...बहादुर स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए...आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया...बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी...अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवा, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर और गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे...


वीर कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल 1858 में जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी...ईस्ट इंडिया कंपनी के भाड़े के सैनिकों को इन्होंने पूरी तरह खदेड़ दिया... उस दिन बुरी तरह घायल होने पर भी इस बहादुर ने जगदीशपुर किले से गोरे पिस्सुओं का यूनियन जैक नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया...वहां से अपने किले में लौटने के बाद 26 अप्रैल 1858 को इन्होंने वीरगति पाई...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मिथिलांचल में 365 दिन की 'उड़ान'


 दरभंगा एयरपोर्ट अपनी उड़ान सेवा के सफर का एक साल पूरा कर चुका है...पिछले साल 8 नवंबर को यहां से उड़ान सेवा की शुरुआत हुई थी...इतने कम समय में इस एयरपोर्ट ने पूरी सुविधाएं बहाल नहीं होने के बावजूद कई उपलब्धियां हासिल कर ली हैं... रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम के तहत देश में दरभंगा सहित 63 शहरों में एयरपोर्ट खोले गए थे... इन 63 एयरपोर्ट्स में यात्रियों के आने-जाने मामले में दरभंगा लगातार नंबर वन पर  है... 


बिहार में हवाई सेवा की अपार संभावनाएं हैं... केंद्र सरकार ने भी बिहार को एविएशन मैप पर लाने की योजना बनाई है... पटना और गया जैसे शहरों के अलावा छोटे शहरों में भी हवाई यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है... तभी तो महज चंद महीने में ही दरभंगा एयरपोर्ट ने यात्रियों के मामले में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है... दरभंगा एयरपोर्ट ने हवाई यात्रियों के मामले में देश के 63 नए एयरपोर्ट्स को पीछे छोड़ दिया है... 


कमाई में नंबर वन

मोदी सरकार ने रीज़नल कनेक्टिविटी स्कीम के तहत देश में 63 नए एयरपोर्ट खोले हैं... दरभंगा में 8 नवंबर 2020 को एयरपोर्ट की शुरूआत हुई थी... सभी 63 नए एयरपोर्ट्स की तुलना में दरभंगा आने और जाने वाले यात्रियों की संख्या सबसे ज्यादा है... पिछले 11 महीने में इस एयरपोर्ट से तकरीबन 4.60 लाख यात्रियों ने टेक ऑफ और लैंड किया है... इस एयरपोर्ट पर दिन 2000 से 2200 यात्री आते-जाते हैं... इस एयरपोर्ट से नॉर्थ बिहार के 18 जिलों और नेपाल के यात्रियों को भी सुविधा हुई है...   


पीएम मोदी का गिफ्ट

दरभंगा को एयरपोर्ट का तोहफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया था... हाल ही में इस एयरपोर्ट के विकास के लिए ज़मीन अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो गया है... योजना के तहत नीतीश कैबिनेट ने 336 करोड़ 76 लाख की राशि स्वीकृत की है... इससे 78 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा... इससे  पहले 31 एकड़ भूमि अधिग्रहण करने का प्रस्ताव था, जिसे बढ़ाकर अब 78 एकड़ कर दिया गया है... विस्तार के बाद कुहासे में भी हवाई जहाज उतर सकेंगे... इसके बाद दरभंगा एयरपोर्ट से सालों भर हवाई जहाज का आना-जाना हो सकेगा... फिलहाल दरभंगा एयरपोर्ट से अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं...  आने वाले समय में यहां नाइट लैंडिंग समेत वह सभी सुविधाएं होंगी जो किसी भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हैं... ये उत्तर बिहार खासकर मिथिला के विमानन सुविधा में मील का पत्थर साबित होगा... 


केंद्र की दिलचस्पी

केंद्र सरकार ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिख कर बिहार के 5 एयरपोर्ट्स को डेवलप करने के लिए सहयोग की मांग की थी... नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने नीतीश कुमार को लिखे पत्र में दरभंगा एयरपोर्ट का भी ज़िक्र किया था... .दरभंगा एयरपोर्ट का संचालन फिलहाल एयरफोर्स की 22 एकड़ जमीन पर किया जा रहा है... इस जमीन को पांच वर्ष के लिए लीज पर लिया गया है... एयरपोर्ट अथॉरिटी और रक्षा मंत्रालय से इस एयरपोर्ट से एक दिन में 20 विमानों के लैंड और टेक ऑफ की अनुमति है... लेकिन फिलहाल यहां से हर दिन 10 से 12 विमानों का आना-जाना हो रहा है..दरभंगा एयरपोर्ट से दुबई के लिए भी कनेक्टिंग फ्लाइट की सुविधा उपलब्ध हो गई है... 


मिथिलांचल का कारोबार बढ़ा

एयरपोर्ट बन जाने से मिथिलांचल का कारोबार भी बढ़ा है... इस बार कार्गो विमान से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू और हैदराबाद के लोगों ने मिथिलांचल की शाही लीची का स्वाद चखा... बेंगलुरू का धनिया पत्ता यहां अपनी खुशबू बिखेर रहा है..इस बार 36 टन लीची इन शहरों में भेजी गई... कार्गो के जरिये यहां प्रति दिन तीन से चार टन धनिया आ रहा है...अगले साल से यहां का प्रसिद्ध मखाना, मछली और पान को देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजने की योजना है... राज्य में एविएशन सेक्टर में अपार संभावनाएं नज़र आ रही हैं... और आने वाले दिनों में मिथिलांचल के यात्रियों को भी बड़ी उम्मीदें हैं... 

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

मन और सेहत दोनों के लिए खास है मिथिला का मखाना (वर्ल्ड फूड डे पर विशेष)

 



वर्ल्ड फूड डे पर बात करते हैं विश्व प्रसिद्ध मखाना की...जो मिथिलांचल की पहचान है...मन को भाने वाले मखाना का मुरीद हर कोई है...देश के अलावा विदेशों में भी इसकी खासी डिमांड है...


सेहतमंद है मखाना

मखाना का खीर तो बनता ही है...साथ ही साथ इसको लोग घी में भूनकर भी खाते हैं...नाश्ते से से लेकर व्रत त्योहार तक में इसका उपयोग होता है...इसीलिए इसे सुपरफूड कहा जाता है...मखाना को डाइट में भी शामिल लोग करते हैं...ये सेहत और फिटनेस के लिए एक अच्छा आहार है... इसलिए न सिर्फ भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी मखाना काफी अधिक प्रचलित है...मखाना की खेती बिहार के मधुबनी, दरभंगा, फारबिसगंज और पूर्णिया जिला में सबसे ज्यादा होती है...


मखाना के गुण के बारे में जानिए

मखाना कार्बोहायड्रेट, फाइबर, पौधा आधारित प्रोटीन और मैग्नीशियम, पोटेशियम, जिंक जैसे न्यूट्रिएंट का भी अच्छा साधन है... 

इसमें कोलेस्ट्रॉल, फैट और सोडियम की मात्रा कम होती है और इसलिए ये एक अच्छे स्नैक का विकल्प है...साथ ही, इनमें मैग्नीशियम की मात्रा ज्यादा होती है और सोडियम की कम...इसीलिए हाई ब्लड प्रेशर, मोटापे और दिल  से संबंधित परेशानियों से जूझ रहे लोगों को इसे अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए...मखाना का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और इसलिए डायबिटीज के मरीज भी डॉक्टर की सलाह पर मखाना या इससे बने उत्पाद अपनी डाइट में ले सकते हैं...इसमें एक ‘एंटी एजिंग एंजाइम’ भी होता है, जो ख़राब प्रोटीन को सही करने में मदद करता है...मखाना ग्लूटन-फ्री होता है...और इसमें प्रोटीन और फाइबर की ज्यादा मात्रा होती है...मखाना में कैलरी भी कम होती है और इसीलिए वजन कम करने पर मेहनत कर रहे लोग भी इन्हें अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं... 


मखाना का पुराना है इतिहास

करीब 200 साल पहले से भारत में मखाना की खेती हो रही है...और तब से ही ये भारत में आयुर्वेद का हिस्सा है...भारतीय आयुर्वेद के अलावा, चीन में भी पारंपरिक औषधियां तैयार करने में सालों से इसका प्रयोग किया जा रहा है...


गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

माता उच्चैठ की प्रतिमा पर मूर्ख कालीदास ने पोत दी थी कालिख... उसके बाद कालिदास बने विद्धान (दुर्गापूजा विशेष)

 यूं तो मां दुर्गा की महिमा सब जानते हैं... लेकिन हर सिद्धपीठ की कहानी और भी रोचक है... तो आइये इसी कड़ी में बताते हैं बिहार के मधुबनी जिले के उच्चैठ में स्थित सिद्धपीठ माता उच्चैठ भगवती से जुड़ी कहानी... यही वो माता हैं जिनके आशीर्वाद से महामूर्ख कालिदास विद्धान कालीदास कहलाए...


कालीदास ने क्यों पोत दी माता उच्चैठ की प्रतिमा पर कालिख?


मान्यता है कि उच्चैठ मंदिर के पूरब दिशा में एक संस्कृत पाठशाला थी... मंदिर और पाठशाला के बीच एक विशाल नदी थी... मूर्ख कालिदास अपनी विदूषी पत्नी विद्दोतमा से तिरस्कृत होकर मां भगवती के शरण में उच्चैठ आ गए... और उस विद्यालय के आवासीय छात्रों के लिए खाना बनाने का काम करने लगे... विद्यालय के छात्र काली मंदिर में हर रोज शाम में दीप जलाते थे.. लेकिन एक बार जब नदी में भयंकर बाढ़ आई तो पानी के तेज बहाव के चलते छात्रों ने काली मंदिर जाने से मना कर दिया... छात्रों ने कालिदास को महामूर्ख जान उसे मंदिर में दीप जलाने का आदेश दिया। साथ ही, छात्रों ने मंदिर की कोई निशानी लाने को कहा, ताकि ये साबित हो सके कि वो मंदिर तक पहुंचा था... आदेश के बाद कालिदास दीप जलाने के लिए नदी के रास्ते किसी तरह मंदिर तक पहुंचे... दीप जला दिया और जब निशान छोड़ने की बात आई तो उन्होंने दीप की कालिख को हाथ पर लगाया और माता की प्रतिमा पर कालिख लेप दिया.. कहते हैं कि इस घटना से मां काली को कालिदास पर दया आ गई.. और मां ने प्रकट होकर कालिदास से वरदान मांगने को कहा.. कालिदास ने अपनी पत्नी से तिरस्कृत होने की कहानी मां काली को सुनाई... कालिदास की कहानी सुनकर भगवती काली द्रवित हो गईं और उन्होंने कलिदास को वरदान दिया कि वो उस रात जितनी भी पुस्तकों को स्पर्श कर देंगे वो उन्हें याद हो जाएगी... कालिदास आवसीय परिसर लौटे और सारे छात्रों की सभी किताबों को उलट पलट दिया.. इसके बाद कालिदास महामूर्ख से महान विद्वान कालिदास बन गए... इसके बाद उन्होंने अभिज्ञान शाकुंतलम, कुमार संभव, मेघदूत, रघुवंश महाकाव्य जैसी कालजयी रचनाएं की...


पाठशाला के अवशेष अभी हैं


उच्चैठ में आज भी वो नदी है... उस पाठशाला के अवशेष मंदिर के निकट मौजूद है... इतना ही नहीं, मंदिर परिसर में कालिदास के जीवन सम्बंधित चित्र अंकित हैं...


शिलाखंड पर बनी हैं देवी की मूर्ति

उच्चैठ भगवती की मूर्ति काले शिलाखंड पर स्थित है... यहां पर मैया का आसन कमल है... और सिर्फ कंधे तक का ही हिस्सा नजर आता है... सिर नहीं होने की वजह से इन्हें छिन्नमस्तिका भगवती के नाम से भी भक्त जानते हैं...


श्मसान में साधना और बलि की प्रथा

उच्चैठ भगवती मंदिर परिसर में ही एक श्मशान है... जहां पर तंत्र साधना की जाती है.. .साथ ही यहां पर मुराद पूरी होने पर भक्तों की ओर से बलि प्रदान की जाती है... कहा जाता है कि, बलिप्रदान के दौरान निकलने वाले रक्त पर मक्खी नहीं भिनभिनाती है... साथ ही पास का तालाब रक्त से लाल हो जाता है...


भगवान राम भी कर चुके हैं मां छिन्नमस्तिका का दर्शन

माना जाता है कि उच्चैठ में छिन्न मस्तिका मां दुर्गा स्वयं प्रादुर्भूत हैं और  मां की दरबार में हाजिरी लगाने वालों की हर इच्छा पूरी होती है... माता के इस अवतार को नवम रूप सिद्घिदात्री और कामना पूर्ति दुर्गा के रूप में भी लोग पूजते हैं... मान्यता है कि भगवान श्री राम भी जनकपुर की यात्रा के समय उच्चैठ भगवती के दर्शन किये थे...


बुधवार, 15 सितंबर 2021

रघुवंश बाबू देसी अंदाज के मॉर्डन नेता थे



 बिहार के राजनीति के महाराणा प्रताप आदरणीय रघुवंश प्रसाद सिंह का जन्म 6 जून 1946 को गणतंत्र की आदिभूमि वैशाली के शाहपुर में हुआ था और 13 सितंबर 2020 को उनका महापरिनिर्वाण हुआ । उनका पूरा जीवन लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के विचारों के प्रति समर्पित रहा। गरीब और वंचित वर्ग के कल्याण के लिए उनका समर्पण सदैव याद किया जाएगा। उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय से गणित में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी ततपश्चात 1969 से 1974 तक जगतजननी माँ जानकी की प्रकट भूमि सीतामढ़ी के ख्यातिलब्ध श्री राधाकृष्ण   गोयनका कॉलेज में अप्लायड मैथेमेटिक्स जैसे कठिन विषय में प्रोफेसर के तौर काम करते रहे । उनके करीबी बताते है कि उस समय उनकी तनख्वाह इतनी कम थी घर पर पैसे भेजने के बाद उनके पास दो वक्त खाने के लिए पैसे नहीं बचते थे ,अक्सर शाम का भूंजा की रात का खाना हो जाया करता था.  लेकिन पहली बार 1970 में रघुवंश प्रसाद शिक्षक आंदोलन के दौरान जेल गए इसी दौरान रघुवंश प्रसाद सिंह को बिहार की तत्कालीन कांग्रेस सरकार प्रोफेसर के ओहदे से बर्खास्त कर दिया फिर बाबू रघुवंश जय प्रकाश नारायण के रास्ते पर चल पड़े । और जब साल 1977 में आपातकाल हटने के बाद हुए विधानसभा चुनाव में रघुवंश बाबू को न सिर्फ सीतामढ़ी की बेलसंड सीट से टिकट मिला, बल्कि चुनावी जीत भी दर्ज की. मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने कर्पूरी ठाकुर का समर्थन किया बाद में लालू से इनकी नजदीकियां बढ़ी. इसके बाद रघुवंश प्रसाद सिंह ने दोबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारत के संविधान में प्रदत्त राज्य नीति के निदेशक तत्व (भाग 4; अनुच्छेद 36-51) के तहत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दर्शन 'प्रत्येक हाथ को काम' को साकार करने में रघुवंश बाबू का अग्रणी भूमिका रही है।  ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सरकार द्वारा प्रत्येक हाथ को काम प्रदान करने के उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद - 41 के तहत विश्व के सबसे बड़े रोजगार गारंटी कार्यक्रम "महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम" की आधारशीला रखी गई थी। इस फ्लैगशिप योजना की शुरुआत आंध्र प्रदेश राज्य के अनंतपुर जिले से 2 फरवरी 2006 को की गई श्री रघुवंश बाबू तरकस के सारे तीरों का कानूनसम्मत प्रयोग करते हुए राष्ट्र के श्रमिकों को एक युग परिवर्तनकारी वैधानिक अधिकार  देकर भगीरथ कार्य किया जिससे  भारत में बेरोज़गारों को साल में 100 दिन रोज़गार मुहैया होने लगा । यूपीए  1 में रघुवंश बाबू ग्रामीण विकास मंत्री थे  इसलिए इस  क़ानून का असली शिल्पकार उन्हें ही माना जाता है । आज कोरोना काल में मनरेगा की प्रासंगिकता शीर्ष पर है। करोड़ो प्रवासी श्रमवीरों को समायोजित करने के मामले में यह ऐतिहासिक रोजगार गारन्टी कार्यक्रम सम्पूर्ण विश्व में प्रतिमान स्थापित कर चुका है । वर्ष 1919 में अस्तित्व में आई जेनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी 90वें वार्षिक प्रतिवेदन में अक्षरशः कहा था कि दुनिया जब 2008-09 की अवधि में गम्भीर वैश्विक आर्थिक मंदी  का सामना कर रही थी ऐसे में भारत इस मंदी से लगभग अछूता रहा था। क्योंकि मनरेगा ने भारत में लोगों की क्रय शक्ति को बल प्रदान करने का काम किया था। यहां तक कि विश्व बैंक ने वर्ष 2014 में इस योजना को 'ग्रामीण विकास का तारकीय उदाहरण' पदावली से अलंकृत किया है । भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के तीसरे खण्ड   में अपने कर्मयोगी मंत्रिमंडलीय साथी रघुवंश बाबू के बारे में लिखा है : "गणित के विद्वान प्रो. रघुवंश प्रसाद सिंह एक विलक्षण पुरुष हैं। मुझे ज्ञात हुआ है कि उनके लेक्चर के दौरान कक्षा में  पिन ड्रॉप साइलेंस व्याप्त हो जाया करती थी , 'एप्लाइड मैथेमेटिक्स' जैसे कठिन विषय को हिंदी माध्यम में पढ़ाने-समझाने की अद्भुत क्षमता थी उनकी।" भारतवर्ष की आत्मा देश के 6.42 लाख गाँवों में बसती है जब कभी भी जहाँ कहीं भी गरीब-गुरबा और ग्रामीण भारत की बात चलेगी बाबू रघुवंश सिंह हमेशा याद किए जाएंगे । 

सोमवार, 30 अगस्त 2021

बिहार के गीतकार शैलेंद्र को क्यों कहा जाता था बागी ?

कैसे घोल दिया पूरब का रंग

रावलपिंडी में पला बढा इंसान अपने गीतों में पूरब का इतना बेजोड़ रंग इसलिए घोल सका...क्योंकि उनका संबध बिहार से था..शैलेंद्र के दादाजी यानी केसरीलाल का संबंध बिहार से था... बचपन के कुछ दिन मथुरा में गुजरा...अपने पुरखों की धरती बिहार की खुशबू से लबरेज शैलेंद्र की रावलपिंडी, मथुरा और बंबई की यायावरी ने ही तो उनके व्यक्तित्त्व में उर्दू हिंदी यानी गंगा जमुनी तहजीब की इतनी सम्मिलित मिठास भर दी...जो उनके गीतों के माध्यम से आज भी श्रोताओं को पूरबा बयार सी शीतलता प्रदान कर रही है...


शैलेंद्र एक बागी गीतकार थे

शैलेंद्र को  एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद करते हैं जिन्होंने गीत लेखन के तमाम प्रचलित मुहावरों से हटकर अपना एक अलग रंग जमाया... जिसमें लोक का रंग और सादापन सबकुछ था... हर कलाकार के अंदर एक बागी की आत्मा निवास करती है जो उसे रूढियों और प्रचलन के विरुद्ध जाने के लिए बाध्य करती है... शैलेंद्र भी सचमुच में एक बागी गीतकार थे


ठेठ हिंदी में गीत लेखन

थियेटर की कोख से नए-नए जन्मे हिंदी सिनेमा के लिए उस समय ठेठ हिंदी में गीत लेखन के बारे में सोचना भी दुश्वार था... उर्दू और फारसी के अल्फाजों के बगैर संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन और गीतलेखन की कतई गुंजाइश नहीं थी...शैलेंद्र ही अकेले हैं, जिनके गीतलेखन के क्षेत्र में भाषा और शिल्प को लेकर नए प्रयोग मिलते हैं... कुल मिलाकर कह सकते हैं शैलेंद्र पहले गीतकार हुए जिन्होंने गीत लेखन को आम जनों की जुबान में ढाला...


देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे... हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला...लेकिन आज तक इस गीतकार को कोई राजकीय पुरस्कार नहीं मिलना हैरान करता है.... 

सोमवार, 2 अगस्त 2021

मधुश्रावणी में बासी फूल से मां गौरी की पूजा

 मिथिलांचल में इन दिनों मधुश्रावणी पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. नवविवाहिता अपने पति की दीर्घायु होने के लिए मधुश्रावणी व्रत मनाती हैं. चौदह दिनों तक ये पूजा होती है. मधुश्रावणी में सुबह और दोपहर में कथा वाचन होता है. शादी के बाद पड़ने वाले पहले श्रावण कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि से शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक नाग देवता, गौरी, गणेश और महादेव की पूजा होती है. नवविवाहिता सज-संवरकर फूल चुनने बगिया में जाती है. इस दौरान नवविवाहिताओं की पूरी टोली होती है.

मधुश्रावणी में बासी फूल से मां गौरी की पूजा होती है. नवविवाहिता चौदह दिनों तक फूल की बगिया से फूल चुनती है. उसे डाली में सजाती है, फिर
अगले दिन बासी फूल से मां गौरी की आराधना की जाती है. पूजा के दौरान प्राचीनकाल की कथाएं सुनती हैं.

स्कन्द पुराण के मुताबिक नाग देवता और मां गौरी की पूजा करने वाली महिलाएं जीवनभर सुहागिन बनी रहती हैं. प्राचीन काल में कुरुप्रदेश के राजा को तपस्या से प्राप्त अल्पायु पुत्र चिरायु भी अपनी नवविवाहिता पत्नी मंगलागौरी की नाग पूजा से दीर्घायु होने में सफल रहा था. पुत्र के दीर्घायु होने से प्रसन्न राजा ने इसे राजकीय पूजा का स्थान दिया था. मिथिलांचल में इस पर्व का विशेष महत्व है.

ससुराल के सामान से होती है पूजा

मधुश्रावणी में चौदह दिनों तक सभी नवविवाहिताएं पूरी निष्ठा से बिना नमक के सात्विक भोजन करती हैं. इस दौरान ससुराल से आए अरबा चावल, घी, चना और फलों का सेवन करती हैं. इतना ही नहीं प्रसाद स्वरूप ससुराल से आए अंकुरित बदाम महिलाओं के बीच वितरण करने की परंपरा है. इसके पीछे जीवन को अंकुरित करने की सोच है. कहा जाता है कि विवाह के बाद स्त्रियों का अपने मायके से अधिकार सीमित हो जाते हैं, इसलिए इस अवधि में उनकी व्रत, पूजा और भोजन का सामान ससुराल आता है.


दीये की बाती से देती हैं अग्निपरीक्षा

मधुश्रावणी के अंतिम दिन नवविवाहिता की परीक्षा जलते अग्नि की टेमी (बाती) से की जाती है जिसमें सौभाग्य के प्रतीक उनके पति के उपस्थित होने की परंपरा है. मान्यता है कि पूर्ण पतिव्रता नारी के शरीर में स्पर्श होते ही आग शीतल हो जाती है और उसे कुछ नहीं होता. इसके बाद सुहागिनों से नवविवाहिता को आशीर्वाद मिलते हैं और कथावाचिका को श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा और विदाई दी जाती है.

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

235 साल का गोलघर

 पटना का गोलघर ऐतिहासिक धरोहर है...इसे बिहार का शान कहा जाता है...पटना की पहचान है गोलघर...पटना में गांधी मैदान के पश्चिम में स्थित है गोलघर...20 जुलाई 2021 को ये गोलघर 235 साल का हो गया है...गोलघर को 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया...

क्यों बनाया गया गोलघर?

1770 में आई भयंकर सूखे के दौरान करीब एक करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए थे...तभी तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने गोलघर के निर्माण की योजना बनाई.... ब्रिटिश इंजिनियर कप्तान जॉन गार्स्टिन ने अनाज के भंडारण के लिए  गोल ढांचे का निर्माण 20 जनवरी 1784 को शुरू किया...ब्रिटिश फौज के लिए इसमें अनाज सुरक्षित रखने की योजना थी...इसका निर्माण कार्य ब्रिटिश राज में 20 जुलाई 1786 को पूरा हुआ...इसमें एक साथ 1,40,000 टन अनाज रखने की क्षमता है...

क्यों ख़ास है गोलघर?

गोलघर का आकार 125 मीटर है...इसकी ऊंचाई 29 मीटर है...इसमें कोई पिलर नहीं है... इसकी दीवारें आधार में 3.6 मीटर मोटी है...गोलघर के हाइट यानी शिखर पर करीब तीन मीटर तक ईंट की जगह पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है...गोलघर के शीर्ष पर दो फीट 7 इंच व्यास का छिद्र अनाज डालने के लिये छोड़ा गया था...जिसे बाद में भर दिया गया...इसमें 145 सीढियां हैं...जिसके सहारे आप इसके ऊपरी सिरे पर जा सकते हैं...जहां से पटना के शहर के एक बड़े भाग और गंगा के विहंगम दृश्य को देख सकते हैं...गुम्बदाकार आकृति के कारण इसकी तुलना 1627-55 में बने मोहम्मद आदिल शाह के मकबरे से की जाती है...गोलघर के अंदर एक आवाज 27-32 बार प्रतिध्वनित होती है...जो अपने आप में अद्वितीय है...


पटना आने वाले एक बार जरूर इस ऐतिहासिक धरोहर का दीदार करते हैं...ये एक प्रमुख पर्यटक स्थल है...यहां पर संगीत फव्वारा का भी इंतजाम किया गया है...अगर आपने  अभी तक इसको नहीं देखा तो जरूर देखिए...

रविवार, 11 जुलाई 2021

RCP सिंह का पावर पंच

 जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह को मोदी मंत्रिमंडल  में जगह मिली है. उन्हें स्टील मंत्री बनाया गया है. पिछली बार आरसीपी सिंह मंत्री बनते बनते रह गए थे. आरसीपी सिंह के नाम से चर्चित जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र प्रसाद सिंह नीतीश कुमार के सबसे करीबी माने जाते हैं. उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे आरसीपी सिंह के पास प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों तरह के अनुभव हैं. मूलरूप से नालंदा के रहने वाले आरसीपी सिंह उसी कुर्मी समुदाय से आते हैं जिससे बिहार के सीएम नीतीश कुमार का ताल्लुक है. उनकी जेडीयू में नेता नंबर दो की हैसियत है और वह 2010 से राज्यसभा सांसद हैं.


बताया जाता है कि 1996 में जब नीतीश कुमार केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई सरकार में मंत्री थे तभी उनकी नजर आरसीपी सिंह पर पड़ी थी. उन्होंने रेल मंत्री बनने के बाद आरसीपी सिंह को अपना विशेष सचिव बना लिया. 2005 में जब बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने आरसीपी सिंह को दिल्ली से बिहार बुला लिया.

2005 से 2010 तक आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के प्रधान सचिव के तौर पर कार्य करते रहे. 2010 में आरसीपी सिंह ने नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली और उन्होंने राजनीति में कदम रख दिया. 2010 में नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को राज्यसभा भेज दिया. तब से अबतक आररसीपी सिंह जेडीयू में लगातार अपने आप को मजबूत करते रहे. बिहार की राजनीति में मजबूत छवि के साथ आज उनकी हैसियत पार्टी में नंबर दो की है.




पशुपति बने 'पारस'


 पशुपति कुमार पारस बिहार की राजनीति  का सीधा-साधा और सरल चेहरा. चंद दिनों पहले तक पशुपति पारस की पहचान केवल और केवल रामविलास पासवान  के छोटे भाई के रूप में होती थी. 12 जुलाई 1952 को खगड़िया के शाहरबन्नी गांव में जन्मे पशुपति पारस तीनों भाइयों में दूसरे नंबर के हैं. भाई रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले पशुपति पारस 1977 में पहली बार अलौली से विधायक बने और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. बिहार सरकार में तीन टर्म मंत्री रहने वाले पशुपति पारस वर्तमान में हाजीपुर से सांसद हैं.

पशुपति पारस पिछले महीने बिहार की राजनीति में तब हॉट टॉक बन गए जब उन्होंने भतीजे चिराग पासवान पर तानाशाही का आरोप लगाया. फिर पार्टी के चार सांसदों के समर्थन से लोकसभा में एलजेपी संसदीय दल के नेता बन गए. इतना ही नहीं पशुपति पारस ने एलजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई और एलजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. पशुपति पारस के पास फिलहाल अपने जीवन का सबसे बड़ा पद है. साथ में सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी. देखना ये होगा कि अपने भाई रामविलास पासवान की तरह पशुपति पारस एलजेपी को मजबूत करने में कितना सफल होते हैं.

पशुपति पारस का राजनीतिक सफर

1977 में पहली बार अलौली से विधायक बने

1985,1990, 1995, 2000, फरवरी 2005, नवंबर 2005 में विधायक

2017 से 2019 तक MLC

1900 से 1995 तक वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री

1995 से 1997 तक गृह कारा एवं निबंधन मंत्री

2017 से 2019 तक मत्स्य एवं पशुपालन मंत्री

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

दगाबाज राइफल...!

 यूं ही कोई बेवफा नहीं होता, कुछ तो मजबूरियां रही होगी...ये बातें इन दिनों बिहार पुलिस पर सटीक बैठती है...अब आप पूछेंगे ऐसी क्या बात हो गई...जो बात बेवफाई तक पहुंच गई...तो आइये  आपको विस्तार से बता ही देते हैं...दरअसल एक नहीं कई ऐसे मौके आए हैं...जब बिहार पुलिस सब कुछ ठीक ठाक करने की सोचती है...तो उसकी सोच पर पानी फिर जाता है...इस बार भी 5  अप्रैल को ऐसा ही हुआ...मौका था AIMPLB के महासचिव और खानकाह रहमानी मुंगेर के सज्जाद नशीन हजरत मौलाना वली रहमानी को मुंगेर के खानकाह परिसर में सुपुर्दे खाक करने  का...राजकीय सम्मान के साथ उन्हें विदाई देनी थी...तैयारी भी पूरी थी...लेकिन जब बात राइफल से गोली निकलने की आई तो सबकुछ चौपट हो गया...राइफल ऐन वक्त पर धोखा दे गया...गोली  ही नहीं चली...बड़ी किरकिरी हो गई...किसी तरीके से दस में से चार राइफल से गोली निकली और कोरम पूरा किया गया...

सवाल ये उठने लगा कि, गलती किसकी थी...राइफल दगाबाज निकला या फिर चलाने वाला ही अनट्रेंड था...ये जांच का विषय है...जांच बिठा भी दी गई है...रिपोर्ट आएगी तो गाज गिराई  जाएगी...कार्रवाई जब होगी तब देखी जाएगी...लेकिन ये कोई पहला मौका नहीं था जब राजकीय सम्मान में सलामी के वक्त राइफल से गोली नहीं निकली...

कब कब नहीं निकली राइफल से गोली

21 अगस्त 2019 को बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा का सुपौल जिले के पैतृक गांव बलुआ में अंतिम संस्कार हुआ...राजकीय सम्मान के तहत उन्हें 21 बंदूकों की  सलामी दी जानी थी...लेकिन ये पूर्व मुख्यमंत्री की बदकिस्मती कहिए या फिर पुलिस के जवानों का अनट्रेंड होना और नहीं तो ये भी कह सकते हैं कि, सारा दोष राइफल का ही था...एक भी  राइफल से गोली नहीं निकली...यहां भी जांच की बात कहकर खानापूर्ति कर दी गई...

6 फरवरी 2020 को जम्मू कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान रमेश रंजन को अंतिम विदाई देने के वक्त भी बंदूक से गोली नहीं निकली...भोजपुर जिले के  जगदीशपुर इलाके में वीर सपूत को नमन करना था...लेकिन राइफल टांय टांय फिस्स हो गया...वो तो वहां पर लाज बचा ली सीआरपीएफ के जवानों ने जिन्होंने अपने साथी को इंसास राइफल से  सलामी दे दी...हमारे बिहार पुलिस के जवान तो कंधे पर बंदूक धरे के धरे ही रह गए...

बिहार में पुलिस ट्रेनिंग सेंटर

बिहार पुलिस को ट्रेनिंग देने के लिए राज्य में तीन ट्रेनिंग सेंटर हैं...

1. भागलपुर के नाथनगर में सिपाही प्रशिक्षण केन्द्र 

2. राजगीर पुलिस अकादमी

3. डुमरांव मिलिट्री पुलिस ट्रेनिंग सेंटर 

बदलाव की तैयारी

बिहार पुलिस के जवानों को और चुस्त दुरुस्त बनाने के लिए बिहार पुलिस के एक्सपर्ट के साथ-साथ आर्मी और पैरामिलिट्री फोर्स के अफसरों से भी ट्रेनिंग मिलेगी...बेसिक ट्रेनिंग के लिए 9  केन्द्रों का चयन किया गया है...रीजनल ट्रेनिंग सेंटरों के अलावा कांस्टेबल ट्रेनिंग स्कूल सिमुलतला का चयन भी हुआ है...फिलहाल ये बीएमपी-11 जमुई में रीजनल ट्रेनिंग सेंटर के तौर पर काम  कर रहा है...इसके अलावा डेहरी ऑन सोन, जमालपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सुपौल, डुमरांव और कटिहार स्थित बीएमपी बटालियन के रीजनल ट्रेनिंग सेंटर में होगा...

उम्मीद करते हैं कि, इस बदलाव से अब आगे न राइफल पर दगाबाजी का इल्जाम लगेगा...और न ही पुलिसकर्मियों के ट्रेनिंग पर सवाल उठेंगे...


बुधवार, 10 मार्च 2021

होली में दिल मिल जाते हैं...

 "मुझे ये भी याद नहीं रहता, रंग कौन से मुझको प्यारे हैं

मेरी शौक पसंद मेरी, बिन तेरे सब बंजारे हैं"


मनोज मुंतशिर की ये लाइनें इस वक्त बिहार की सियासत या यूं कहें कि, उपेंद्र कुशवाहा पर बिलकुल सटीक बैठती है...'जेडीयू से कब बाहर निकला, और नीतीश कुमार से कब मैं अलग था'...ये बयान देकर उपेंद्र के दिल की बात जुबां पर आ गई है....सियासत के 'स' ताल्लुक रखने वाले समझ चुके हैं कि, कुशवाहा क्या चाहते हैं...कहते हैं सियासत में कुछ भी हो सकता है...क्योंकि मतभेद में गुंजाइश बनी रहती है...मनभेद में गुंजाइश थोड़ी कम रहती है...उपेंद्र कुशवाहा
का नीतीश से मतभेद था, मनभेद नहीं...बहुत दिनों तक अपने दोस्त से जुदा होने के बाद अब वो दोस्त के गले लगने को बेकरार हैं...होली दहलीज पर है...और कहते हैं न कि होली में हर गिले शिकवे दूर हो जाते हैं...लोग हर पुरानी बात को भूल कर एक दूसरे के गले लगते हैं...बस इसी बात तो उपेंद्र कुशवाहा चरितार्थ करने जा रहे हैं...

नीतीश ने हमेशा दिया सम्मान

नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को हमेशा से सम्मान दिया है...2004 में कुशवाहा को नेता प्रतिपक्ष बनाकर ये संदेश दिया कि, उपेंद्र उनके दिल के कितने करीब हैं...2010 में राज्यसभा भेजा तो फिर से अपने बड़प्पन का परिचय नीतीश कुमार ने दिया..

उपेंद्र का लक्ष्य था नीतीश के पैरलर खड़ा होना

जिस नीतीश कुमार ने हमेशा उपेंद्र कुशवाहा को इज्जत बख्शी...उस उपेंद्र कुशवाहा ने जब जब जेडीयू का दामन छोड़ा...तब तब नीतीश कुमार के पैरलर खड़े होने की कोशिश की...मानव श्रृंखला हो या फिर शिक्षा या सामाजिक कुरितियां...हर मुद्दे पर उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश के अंगेस्ट  में अपनी राजनीतिक दीवार मजबूत करने कोशिश...और हर बार नाकामी हाथ लगी...नीतीश से सियासी दुश्मनी के चक्कर में उनकी पार्टी में न कोई विधायक बचा और न ही कोई सांसद...यहां तक की वो खुद भी संसद और विधानसभा के परिसर से दूर हो गए...

एक नजर उपेंद्र कुशवाहा के सियासी सफर पर

उपेंद्र कुशवाहा 1985 में राजनीति में प्रवेश किए...1988 तक युवा लोकदल के राज्य महासचिव रहे...फिर 1988 से 1993 तक राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी मिली...1994 में समता पार्टी का महासचिव बने...2000 में पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बने...2004 में नीतीश ने नेता प्रतिपक्ष बनाया...2005 से नीतीश से रिश्तों में खटास आई...उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू से रिश्ता तोड़ लिया...नेशनल कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए...2009 फिर से जेडीयू में वापस आए...2010 में बने राज्यसभा सदस्य...नीतीश से फिर से रिश्तों में खटास आई...राज्यसभा का कार्यकाल नहीं हुआ पूरा...राज्यसभा से कुशवाहा ने इस्तीफा दे दिया...कुशवाहा ने 2013 में RLSP का गठन किया...फरवरी 2014 को NDA में शामिल हो गए...2014 के लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीती...मोदी कैबिनेट में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री रहें...2019 लोकसभा चुनाव से पहले NDA से नाता टूटा...NDA से अलग होने के बाद महागठबंधन में शामिल हुए...2019 लोकसभा चुनाव में दो जगहों से लड़े, दोनों जगह हारे...लोकसभा चुनाव में RLSP को एक भी सीट नहीं मिली...2020 में महागठबंधन से अलग होकर विधानसभा लड़ेविधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुला....

सियासी जमीन पर कुशवाहा ने हर पिच पर खेला...हर खिलाड़ी के साथ जोड़ी बनाई...लेकिन नीतीश जैसा न तो दोस्त मिला न ही जोड़ीदार...और न ही जेडीयू जैसी सम्मान वाली पार्टी...इसीलिए अब वो फिर से घर लौट रहे हैं...शायद वो यही कहना चाह रहे हैं कि, तेरे जैसे यार कहां, कहां ऐसा याराना...


रविवार, 28 फ़रवरी 2021

जान पर भारी 'जाम'

बिहार के वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यही लगता है कि शराबबंदी अपने लक्ष्य से भटक चुकी है. शराब तस्करी से जुड़े लोग इतने बेखौफ हो गए हैं कि, उन्हें कानून का जरा भी खौफ नहीं. बेखौफ माफिया छापेमारी पर जाने वाली पुलिस टीम पर हमला कर देते हैं. इस हमले में कई की जान जा चुकी है.

अप्रैल 2016 से बिहार में शराबबंदी लागू है. सीएम नीतीश कुमार ने सामाजिक कल्याण के मकसद से इसे राज्य में लागू किया. शांति से शादी ब्याह हो, किसी सामाजिक कार्यक्रम में हंगामा न हो, शराब के चलते किसी का घर नहीं उजड़े, कोई महिला प्रताड़ना की शिकार न हो. किसी मां की कोख शराब के चलते सूनी न हो और किसी बुजुर्ग का सहारा न छिने. इसी सब बातों को ध्यान में रखकर शराबबंदी कानून उन्होंने लागू किया लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यही लगता है कि, शराबबंदी अपने लक्ष्य से भटक चुकी है. शराब तस्करी से जुड़े लोग इतने बेखौफ हो गए हैं कि, उन्हें कानून का जरा भी खौफ नहीं. बेखौफ माफिया छापेमारी पर जाने वाली पुलिस टीम पर हमला कर देते हैं. इस हमले में कई की जान जा चुकी है तो कई जख्मी हो चुके हैं.


24 फरवरी 2021 को सीतामढ़ी में एक दारोगा को तस्करों ने मौत की आगोश में भेज दिया. इससे पहले 28 नवंबर 2017 को समस्तीपुर के सरायरंजन में शराब माफिया की फायरिंग में हवलदार अनिल कुमार शहीद हो गए. 15 दिसम्बर 2018 को भोजपुर में शराब तस्करों का पीछा करते गाड़ी टकराई और ASI दीनानाथ सिंह शहीद हो गए. 20 नवम्बर 2018 को बक्सर के डुमरांव में तस्करों ने पुलिस वाहन पर हमला किया जिसमें पुलिसकर्मी बाल-बाल बचे थे. 11 अक्टूबर 2019 को छपरा में शराब लेकर घुस रहे तस्करों ने पुलिस पर फायरिंग की. 16 जून 2020 को आरा के कौशिक दुलारपुर में पुलिस के हथियार छीने और चंगुल में कैद तस्करों को छुड़ाया. 30 सितंबर 2020 को पटना के जक्कनपुर में तस्करों ने ASI पर हमला किया...10 दिसंबर 2020 को मधुबनी में रहिका के सतलखा गांव में छापेमारी करने गई टीम पर हमला हुआ. 22 फरवरी 2021 को बेगूसराय के पोखरिया में छापेमारी करने गई पुलिस पर पथराव हुआ जिसमें कई खाकीधारी जख्मी हो गए.


जहरीली शराब से जा चुकी हैं सैकड़ों जान


शराब की लत बड़ी मुश्किल से छूटती है. शराबबंदी के बाद चोरी छिपे शराब बनाने का काम गांव मोहल्लों में शुरू हो गया. स्प्रिट का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा जिसके चलते जानें जा रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 15.5 प्रतिशत पुरुषों ने शराब पीने की बात स्वीकार की है. शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की खपत अधिक है. ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 प्रतिशत लोग शराब पीते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ये आंकड़ा 14 फीसदी है. गोपालगंज हो या मुजफ्फरपुर हर जिले में जहरीली शराब से लोगों की जान जा चुकी है.कड़े कानून का पालन नहीं


कानून में प्रावधान है कि अगर आप अपने घर या किसी परिसर में नशे की अनुमति देते हैं या फिर कोई कहीं नशे की हालत में पाया जाता है, किसी जगह शराब पीता है तो ऐसी स्थिति में पकड़े जाने पर कम से कम पांच वर्ष और अधिकतम सात साल की सजा होगी. इतना कठोर कानून के बावजूद बिहार में शराब की बिक्री धड़ल्ले से जारी है.


शराबबंदी लागू करवाने वाले सवालों के घेरे में


शराबबंदी को लागू हुए करीब पांच साल हो चुके हैं. सरकार ने शराबबंदी को लागू कराने का का जिम्मा पुलिस को दिया लेकिन उसी महकमे के कुछ लोग इसे फेल करने में लग गए हैं. यकीन करना मुश्किल होता है लेकिन ये सच है कि चंद पैसों के लिए कई पुलिस वाले शराब तस्करों से मिले हुए हैं. शराब की डोर टू डोर डिलिवरी और चोरी छिपे बेचने में उनका अहम योगदान है. कई थानों को तस्कर इसकेलिये बकायदा एक मोटी रकम का भुगतान करते हैं. कार्रवाई के नाम पर कुछ ठोस नहीं होता. 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

बंगला हो गया खाली

 नीतीश कुमार बहुत ज्यादा बोलते नहीं, करने में विश्वास रखते हैं. सियासी पिच पर ऐसे लोग बहुत कम हैं जो इस फॉर्मूले को अपनाते हैं. हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी पार्टी प्रमुख चिराग पासवान ने जेडीयू का बहुत नुकसान किया था. चिराग ने जिस तरह की पॉलिटिक्स की, उससे 42 सीटों पर जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा. हर जगह वजह चिराग पासवान बने. यहां तक कि जेडीयू से बड़े भाई का तमगा छिन गया. सीटों की संख्या कम हो गई. नीतीश कुमार का रुतबा पहले वाला नहीं रहा. वो धमक नहीं रही. सियासत में नीतीश ने ये दिन शायद ही कभी देखा होगा.


इतना सब कुछ हो गया बावजूद इसके वो चुप रहे. सियासी दांव चलने के लिए वक्त की ओर देखने लगे. संगठन को मजबूत करने में जुट गए. इसकी शुरुआत उन्होंने खुद अध्यक्ष पद छोड़कर की. आरसीपी को पार्टी को कमान दी, जो रणनीति बनाने में माहिर हैं. वक्त बीतता गया और देखते ही देखते उन्होंने ऐसे मास्टरस्ट्रोक पर काम किया, जिसने सबको हैरान कर दिया. और तो और चिराग के पैरों तले से जमीन खिसका दी. 208 एलजेपी नेताओं को अपने पाले में करके दिखा दिया कि सियासत में अभी भी वो चिराग के 'गुरु' हैं.


जेडीयू ने एलजेपी के बंगले में ऐसी सेंध लगाई कि एक झटके में ऊपर से नीचे तक खाली हो गया. तीर से बंगला को धराशायी कर दिया. चिराग खुद को पीएम मोदी का 'हनुमान' कहते थे. उस 'हनुमान' की पूरी सेना को नीतीश के अपने पाले में कर दिया. अब पासवान फैमिली के अलावा पार्टी में कोई दिख नहीं रहा. चुनाव में चिराग की क्या हालत हुई, वो किसी से छुपी नहीं रही. वो खुद अपनी जमीन गंवा बैठे हैं. सियासी पिच में चिराग के सामने घना अंधेरा है. ये अंधेरा बड़ा ही घना है क्योंकि राजनीति में संगठन के बिना कुछ नहीं होता.

ओलंपिक में भारत की आशाएं

हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिल...