मंगलवार, 30 अगस्त 2022

ओलंपिक में भारत की आशाएं






हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं...भारत भी हर बार एक बड़े दल-बल के साथ प्रतियोगिता में हिस्सा लेता है...साल दर साल भारत इस प्रतियोगिता में एक नया इतिहास लिख रहा है...ओलंपिक की शुरुआत जब हुई थी तो भारत ने शानदार प्रदर्शन किया...लेकिन उसके बाद ग्राफ थोड़ा नीचे गया...फिर ऊपर नीचे होते होते वर्तमान समय में थोड़ा सा संतोषजनक है...

फ्रांस के शहर पेरिस में 2024 के ओलंपिक आयोजित किए जाएंगे...ओलंपिक में पहली बार भारत ने 1900 के पेरिस ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया, जहां नॉर्मन प्रिचर्ड देश के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुए...उन्होंने 200 मीटर स्प्रिंट और 200 मीटर हर्डल रेस में दो रजत पदक जीते...

ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक नहीं रहा है...लेकिन इतनी बड़ी आबादी वाले देश में अगर पदक की बात करें तो उस लिहाज से थोड़ा कम दिखायी देता है...और हमें सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है कि क्या सच में, भारत में प्रतिभा की कमी है या भारतीयों में प्रतिभा है ? बस उसे मौका नहीं दिया जाता या उसे दिखाया नहीं जाता है... 

भारत की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है...दुनिया के कई ऐसे देश हैं जिनकी आबादी भारत से बहुत कम है... क्यूबा की जनसंख्या एक करोड़ है लेकिन गोल्ड लाने में वो हमसे आगे है...ऑस्ट्रेलिया जिसकी आबादी मात्र दो करोड़ लेकिन सोना लाने में वो भी अव्वल है...एशिया यूरोप और अफ्रीका के ऐसे बहुत से देश हैं...उनकी आबादी भारत की तुलना में बहुत ही कम है...लेकिन मेडल तालिका में वो हमसे ऊपर रहते हैं...

ये हमारे लिए शोध और सोच विचार करने वाली बात है कि, आखिर हम कहां पिछड़ कहां रहे हैं...ओलंपिक के अधिकतम मेडल व्यक्तिगत में होते हैं... ओलंपिक में लगभग 300 के करीब खेल प्रतियोगिताएं होती हैं मतलब कि 300 से ज़्यादा बार गोल्ड मेडल मिलने की संभावना लेकिन इन खेलों में सबसे ज़्यादा पदक तैराकी या पानी से जुड़े खेलों में होते हैं...

उसी प्रकार दूसरे नंबर पर एथलेटिक्स से जुड़ी  खेल प्रतियोगिता  जिसमें दौड़ना, उछल-कूद जैसे खेल शामिल हैं...इन खेलों में भी लगभग 17 से 18% मेडल होते हैं... इसी तरह जिमनास्टिक खेलों में लगभग 10 से 12% मेडल होते हैं...इन तीनों खेलों को मिला दिया जाए तो करीब  आधे मेडल इनमें शामिल हो जाएंगे...

ये ऐसे खेल हैं जिसमें व्यक्तिगत रूप से खेल प्रतिभा का होना या प्रतिस्पर्धा को जीत पाने की व्यक्तिगत क्षमता महत्व रखती है...भारत अधिकतर जिन खेलों में कोई पदक जीत पाया है, वो खेल हैं हॉकी, पहलवानी, बॉक्सिंग और शूटिंग...टेनिस और बैडमिंटन में भी कुछ पदक पाए हैं...भारत ने इन खेलों में अब तक 9 गोल्ड पर कब्जा किया है...जिसमें से 8 गोल्ड  सिर्फ हॉकी में ही मिले हैं...यानी साफ है कि, अगर हम टीम भावना से खेलते हैं तो सोना पर हमारा कब्जा तय माना जाता है...लेकिन व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में हम अमूमन पीछे रह जाते हैं...

खेल प्रतिस्पर्धा का सेलेक्शन बहुत मायने रखता है...भारतीयों में प्रतिभा की कमी है या फिर हम प्रतिभाओं को मौका नहीं देते हैं...इतना ही नहीं ओलंपिक के माइंड गेम को भी हमें समझना होगा...यही कारण है कि, भारत से आबादी की तुलना में सैकड़ों गुना छोटे देश भी तैराकी, जिमनास्टिक और एथलेटिक्स खेल जैसी प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेकर अधिक से अधिक पदक जीत ले जाते हैं...

ऑस्ट्रेलिया की पदक तालिका पर गौर करेंगे तो भारत के मुकाबले, बहुत कम आबादी होने के बावजूद भी ये हर ओलंपिक में टॉप 10 की सूची में या टॉप पदक विजेता सूची में शामिल होता है...ऑस्ट्रेलिया की टीम मुख्य रूप से तैराकी, दौड़, जंपिंग, एथलेटिक्स और जिमनास्टिक जैसे खेलों में विशेष स्थान रखती है और अधिकतम गोल्ड और रजत पदक पर कब्जा करती है 

अफ्रीका के कई देश, जिनको सामान्य रूप से हम भूगोल या जनरल नॉलेज की किताबों में ही पढ़ते हैं लेकिन पदक तालिका में वो शीर्ष स्थानों में पाए जाते हैं...अगर हमें ओलंपिक जैसी प्रतिस्पर्धा में पदकों की संख्या बढ़ानी है, गोल्ड मेडल की संख्या बढ़ानी है, रजत पदक की संख्या बढ़ानी है तो हमें व्यक्तिगत प्रतिभा वाले खेलों में भारतीयों की रूचि बनानी पड़ेगी... 

तैराकी, एथलेटिक्स और जिमनास्टिक खेल, जिनमें अधिकतर पदक दांव पर लगाया जाता है, उन खेलों पर ध्यान देना पड़ेगा...खेल प्रेमी, खेल परिषद, खेल भावना से भरे देश के उद्योगपति , राजनीतिज्ञ और आम जनता इसमें रूचि लेंगे और और भारत को 2024 ना सही, लेकिन 2028 के ओलंपिक खेलों में पदक तालिका की शीर्ष सूची में शामिल करा पाएगी 

आजादी के पहले  भारतीय हॉकी टीम ने 1928 से 1936 तक ओलंपिक में अपना दबदबा बनाया और अभूतपूर्व तीन खिताब जीते...1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में, भारत ने ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, डेनमार्क और स्विट्जरलैंड को हराकर फाइनल में नीदरलैंड को 3-0 से हराकर अपना पहला स्वर्ण पदक जीता... 1932 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत ने यूएसए को 24-1 से हराया, जो ओलंपिक इतिहास में जीत का सबसे बड़ा अंतर था... 1936 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक फाइनल में उन्होंने जर्मनी को 8-1 से हराया, जो ओलंपिक फाइनल में जीत का सबसे बड़ा अंतर था...

1948 से स्वतंत्र भारत ने 50 से अधिक एथलीटों के प्रतिनिधिमंडल को भेजना शुरू किया... प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व शेफ-डी-मिशन कर रहे थे...भारतीय फील्ड हॉकी टीम ने फाइनल में ग्रेट ब्रिटेन को हराकर 1948 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता...ये आज के भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक था... उन्होंने 1956 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में फाइनल में पाकिस्तान को हराकर लगातार छठा खिताब जीतकर अपना दबदबा जारी रखा...1960 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में फील्ड हॉकी टीम फाइनल हार गई और उसे रजत पदक से संतोष करना पड़ा... हालांकि टीम ने 1964 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में स्वर्ण जीतकर वापसी की, भारत ने अगले दो ओलंपिक में कांस्य पदक जीता...1976 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत 1928 के बाद पहली बार खाली हाथ घर आया...

हॉकी के प्रति लोगों के जुनूनी दौर में टेनिस के प्रति लोगों का ध्यान भारत के टेनिस स्टार लिएंडर पेस ने आकर्षित किया... पेस अटलांटा ओलंपिक में पुरुष एकल स्पर्धा के सेमीफाइनल में पहुंचे... पेस सेमीफाइनल में आंद्रे अगासी के खिलाफ 7-6, 6-3 के स्कोर से हार गए थे... लगातार तीन ओलंपिक से पदक रहित वापसी करने के बाद भारत के लिए पदक एक बड़ी उपलब्धि थी...

पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान खेल में, साक्षी मलिक महिला फ्री स्टाइल 58 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक के साथ ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं...साक्षी मलिक की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि 58 किग्रा भार वर्ग में रियो 2016 ओलंपिक में जीता गया ओलंपिक कांस्य पदक ही है...

केडी जाधव भारत को कुश्ती में पदक दिलाने वाले पहले पहलवान थे जिन्होंने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था...उसके बाद सुशील ने बीजिंग में कांस्य और लंदन में रजत पदक हासिल किया...इसी परंपरा को टोक्यो ओलंपिक में रवि दहिया ने कायम रखा...उन्होंने रजत पदक अपने नाम किया...

2012 में लंदन ओलंपिक भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ ओलंपिक प्रदर्शन रहा है...जिसमें कुल छह पदक हैं, जिसने पिछले खेलों के देश के रिकॉर्ड को दोगुना कर दिया...ये भारतीय खिलाड़ियों के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था क्योंकि शटलर साइना नेहवाल और मुक्केबाज मैरी कॉम ने लंदन में अपने-अपने खेलों में कांस्य पदक जीता था...टोक्यो में भारतीय टीम ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक का सूखा ख़त्म किया... टोक्यो में नीरज चोपड़ा ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया. ...नीरज चोपड़ा ने पहली बार ओलंपिक खेलों में भाग लिया था...साल 2008 में बीजिंग ओलंपिक में 26 साल की उम्र में अभिनव बिंद्रा ने देश को 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग में गोल्ड मेडल दिया...अभिनव देश के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी बन गए जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से गोल्ड मेडल जीता... बीजिंग ओलंपिक में भारत ने एकमात्र पदक नहीं जीता था बल्कि देश मुक्केबाजी और कुश्ती में दो और पदकों के साथ लौटा था...राज्यवर्धन सिंह ने साल 2004 के एथेंस ओलिंपिक खेलों में देश के लिए पहला व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रचा था। ओलिंपिक के इतिहास में पहली बार किसी खिलाड़ी को सिल्वर मेडल हासिल हुआ था...

ये भारत का ओलंपिक के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है... लेकिन ये तो एक शुरुआत है, भारत को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है...हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, बस एक सामूहिक और ईमानदार कोशिश की जरुरत है...उसके बाद तो देश में सोना ही सोना होगा....

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

ललिल बाबू होते तो आज मिथिला की तस्वीर कुछ और होती... (ललित नारायण मिश्र की पुण्यतिथि पर विशेष)

 


ललित नारायण मिश्र का जन्म 2 फरवरी 1923 को सहरसा जिले के बसनपट्टी गांव में हुआ था. वो मिथिला समेत देश के कद्दावर कांग्रेस नेता थे. ललित नारायण मिश्र की हत्या 3 जनवरी 1975 को समस्तीपुर में बम विस्फोट में मौत हो गई. समस्तीपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर ये घटना घटी.


मिथिला, मैथिली से अगाध प्रेम था

ललित बाबू को अपनी मातृभाषा मैथिली से अगाध प्रेम था...मैथिली की साहित्यिक संपन्नता और विशिष्टता को देखते हुए 1963-64 में ललित बाबू की पहल पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उसे 'साहित्य अकादमी' में भारतीय भाषाओं की सूची में सम्मिलित किया...अब मैथिली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में चयनित विषयों की सूची में सम्मिलित है...ललित बाबू पिछड़े बिहार को राष्ट्रीय मुख्यधारा के समकक्ष लाने के लिए सदा कटिबद्ध रहे...उन्होंने अपनी कर्मभूमि मिथिलांचल की राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए पूरी तन्मयता से प्रयास किया...विदेश व्यापार मंत्री के रूप में उन्होंने बाढ़ नियंत्रण एवं कोसी योजना में पश्चिमी नहर के निर्माण के लिए नेपाल-भारत समझौता कराया... उन्होंने मिथिला चित्रकला को देश-विदेश में प्रचारित कर उसकी अलग पहचान बनाई... मिथिलांचल के विकास की कड़ी में ही ललित बाबू ने लखनऊ से असम तक लेटरल रोड की मंजूरी कराई थी...जो मुजफ्फरपुर और दरभंगा होते हुए फारबिसगंज तक की दूरी के लिए स्वीकृत हुई थी... रेल मंत्री के रूप में मिथिलांचल के पिछड़े क्षेत्रों में झंझारपुर-लौकहा रेललाइन, भपटियाही से फारबिसगंज रेललाइन जैसी 36 रेल योजनाओं के सर्वेक्षण की स्वीकृति उनकी कार्य क्षमता, दूरदर्शिता और विकासशीलता के ज्वलंत उदाहरण है...



कैसे हुई बम विस्फोट की घटना?

इंदिरा गांधी सरकार के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे थे. समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर के बीच बड़ी लाइन का उद्घाटन करना था. ललित बाबू पहुंचे… भाषण पूरा किया और मंच से नीचे जब उतरने लगे तो वहां मौजूद दर्शकों की भीड़ में से किसी शख्स ने मंच की ओर बम फेंक दिया. ललित नारायण मिश्र जख्मी हो गए.


बच सकती थी जान!

समस्तीपुर रेलवे स्टेशन से दरभंगा मेडिकल कॉलेज की दूरी 40 से 42 किलोमीटर है. उस दिन DMCH में डॉक्टरों की हड़ताल थी. ब्लास्ट में घायल हुए कई लोगों को इलाज के लिए दरभंगा के मशहूर डॉक्टर नवाब के पास भेज दिया गया. मगर ललित बाबू को पटना भेजने का फैसला हुआ, जो समझ से परे था. क्योंकि ललिल बाबू ऐसे शख्सियत थे जिन्हें अगर दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया जाता तो शायद हड़ताली डॉक्टर इलाज करने से मना नहीं करते. पटना भेजने के फैसले पर आज तक सवाल उठ रहे हैं.


समस्तीपुर से पटना जाने में लगे थे 14 घंटे

ललित बाबू को इलाज के लिए पटना ले जाने के लिए रेल को चुना गया. समस्तीपुर से पटना की दूरी करीब 132 किलोमीटर है, लेकिन ट्रेन को पटना पहुंचने में करीब 14 घंटे का वक्त लग गया. 1975 में बहुत ज्यादा तो पटना पहुंचने में सात घंटे का वक्त लगता, लेकिन लग गया 14 घंटे, ये भी एक अहम सवाल है, जिसका जवाब आज तक नहीं मिला है.


ललित बाबू के बढ़ते ग्राफ से किसको डर था?

सियासी गलियारों में कहा ये जाता है कि, मिथिला के सबसे बड़े जननेता ललित नारायण मिश्र की लोकप्रियता और बढ़ते कद से इंदिरा गांधी को सियासी खतरा का आभास था. इसीलिए कहा ये जाता है कि, जान बूझकर ट्रेन को लेट किया गया. हालांकि, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है. इतना तो तय है कि, अगर आज ललित बाबू होते तो बिहार और मिथिलांचल की तस्वीर कुछ और होती.

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

सरल स्वभाव के 'बाबू' लोकल फॉर वोकल के प्रणेता थे

 देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की विद्धता और महान शख्सियत की चर्चा देश ही नहीं विदेशों में भी होती है...आज उसी महान विभूति भारत रत्न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की जयंती है...


जीवन परिचय

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को प्यार से लोग बाबू राजेंद्र प्रसाद भी कहकर बुलाते हैं...उनका जन्म 3 दिसम्बर 1884 को सीवान के जीरादेई गांव हुआ...उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के विद्वान थे...उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं...पांच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा ग्रहण करना शुरू किया...उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए... राजेन्द्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्यकाल में ही लगभग 13 वर्ष की उम्र में  राजवंशी देवी से हो गया...विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टीके घोष अकादमी से अपनी पढ़ाई जारी रखी...


बाबू की प्रतिभा के सब थे कायल

18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी...उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था... साल 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया...उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले और बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया...1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ एलएलएम की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की...


हर भाषा के प्रेमी लेकिन हिंदी से विशेष लगा
व था

राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी...फिर भी उन्होंने बीए में उन्होंने हिंदी ही ली...वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे...गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था...हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था...हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था...हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे...


लोकल फॉर वोकल के सबसे बड़े उदाहरण

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे...वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे...उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई...उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था...राजेन्द्र बाबू महात्मा गांधी की निष्ठा, समर्पण और साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1928 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया...गांधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था...


देशसेवा सर्वोपरि, सरल स्वभाव

12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अवकाश की घोषणा की...अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार की ओर से सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया...राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा बड़ी सरल थी...उनके चेहरे मोहरे को देखकर पता ही नहीं लगता था कि वे इतने प्रतिभा सम्पन्न और उच्च व्यक्तित्ववाले सज्जन हैं... देखने में वे सामान्य किसान जैसे लगते थे...अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के सदाकत आश्रम को चुना...28 फरवरी 1963 को वे हम सबको छोड़कर चले गए...

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

वीर कुंवर सिंह जैसे योद्धा विरले ही होते हैं



 

80 साल की उम्र में  लड़ने और विजय हासिल करने के लिए अगर किसी शख्स का नाम लिया जाता है तो वो हैं वीर कुंवर सिंह...वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था....वीर कुंवर सिंह सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक थे...अन्याय विरोधी और स्वतंत्रता प्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक थे...


पारिवारिक परिचय

वीर कुंवर सिंह के पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे...उनकी माताजी का नाम पंचरत्न कुंवर था....उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह और इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह,  गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे....ये परिवार अपनी आजादी कायम रखने के खातिर सदा लड़ने के लिए जाना गया...


गजब की थी नेतृत्व क्षमता

1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया...मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे देश में विप्लव मचा दिया... बिहार की दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दी...मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी... ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकु सिंह और भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया...


27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया...अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा...जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई...बहादुर स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए...आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया...बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी...अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवा, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर और गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे...


वीर कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल 1858 में जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी...ईस्ट इंडिया कंपनी के भाड़े के सैनिकों को इन्होंने पूरी तरह खदेड़ दिया... उस दिन बुरी तरह घायल होने पर भी इस बहादुर ने जगदीशपुर किले से गोरे पिस्सुओं का यूनियन जैक नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया...वहां से अपने किले में लौटने के बाद 26 अप्रैल 1858 को इन्होंने वीरगति पाई...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मिथिलांचल में 365 दिन की 'उड़ान'


 दरभंगा एयरपोर्ट अपनी उड़ान सेवा के सफर का एक साल पूरा कर चुका है...पिछले साल 8 नवंबर को यहां से उड़ान सेवा की शुरुआत हुई थी...इतने कम समय में इस एयरपोर्ट ने पूरी सुविधाएं बहाल नहीं होने के बावजूद कई उपलब्धियां हासिल कर ली हैं... रीजनल कनेक्टिविटी स्कीम के तहत देश में दरभंगा सहित 63 शहरों में एयरपोर्ट खोले गए थे... इन 63 एयरपोर्ट्स में यात्रियों के आने-जाने मामले में दरभंगा लगातार नंबर वन पर  है... 


बिहार में हवाई सेवा की अपार संभावनाएं हैं... केंद्र सरकार ने भी बिहार को एविएशन मैप पर लाने की योजना बनाई है... पटना और गया जैसे शहरों के अलावा छोटे शहरों में भी हवाई यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है... तभी तो महज चंद महीने में ही दरभंगा एयरपोर्ट ने यात्रियों के मामले में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है... दरभंगा एयरपोर्ट ने हवाई यात्रियों के मामले में देश के 63 नए एयरपोर्ट्स को पीछे छोड़ दिया है... 


कमाई में नंबर वन

मोदी सरकार ने रीज़नल कनेक्टिविटी स्कीम के तहत देश में 63 नए एयरपोर्ट खोले हैं... दरभंगा में 8 नवंबर 2020 को एयरपोर्ट की शुरूआत हुई थी... सभी 63 नए एयरपोर्ट्स की तुलना में दरभंगा आने और जाने वाले यात्रियों की संख्या सबसे ज्यादा है... पिछले 11 महीने में इस एयरपोर्ट से तकरीबन 4.60 लाख यात्रियों ने टेक ऑफ और लैंड किया है... इस एयरपोर्ट पर दिन 2000 से 2200 यात्री आते-जाते हैं... इस एयरपोर्ट से नॉर्थ बिहार के 18 जिलों और नेपाल के यात्रियों को भी सुविधा हुई है...   


पीएम मोदी का गिफ्ट

दरभंगा को एयरपोर्ट का तोहफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया था... हाल ही में इस एयरपोर्ट के विकास के लिए ज़मीन अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो गया है... योजना के तहत नीतीश कैबिनेट ने 336 करोड़ 76 लाख की राशि स्वीकृत की है... इससे 78 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा... इससे  पहले 31 एकड़ भूमि अधिग्रहण करने का प्रस्ताव था, जिसे बढ़ाकर अब 78 एकड़ कर दिया गया है... विस्तार के बाद कुहासे में भी हवाई जहाज उतर सकेंगे... इसके बाद दरभंगा एयरपोर्ट से सालों भर हवाई जहाज का आना-जाना हो सकेगा... फिलहाल दरभंगा एयरपोर्ट से अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं...  आने वाले समय में यहां नाइट लैंडिंग समेत वह सभी सुविधाएं होंगी जो किसी भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हैं... ये उत्तर बिहार खासकर मिथिला के विमानन सुविधा में मील का पत्थर साबित होगा... 


केंद्र की दिलचस्पी

केंद्र सरकार ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिख कर बिहार के 5 एयरपोर्ट्स को डेवलप करने के लिए सहयोग की मांग की थी... नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने नीतीश कुमार को लिखे पत्र में दरभंगा एयरपोर्ट का भी ज़िक्र किया था... .दरभंगा एयरपोर्ट का संचालन फिलहाल एयरफोर्स की 22 एकड़ जमीन पर किया जा रहा है... इस जमीन को पांच वर्ष के लिए लीज पर लिया गया है... एयरपोर्ट अथॉरिटी और रक्षा मंत्रालय से इस एयरपोर्ट से एक दिन में 20 विमानों के लैंड और टेक ऑफ की अनुमति है... लेकिन फिलहाल यहां से हर दिन 10 से 12 विमानों का आना-जाना हो रहा है..दरभंगा एयरपोर्ट से दुबई के लिए भी कनेक्टिंग फ्लाइट की सुविधा उपलब्ध हो गई है... 


मिथिलांचल का कारोबार बढ़ा

एयरपोर्ट बन जाने से मिथिलांचल का कारोबार भी बढ़ा है... इस बार कार्गो विमान से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू और हैदराबाद के लोगों ने मिथिलांचल की शाही लीची का स्वाद चखा... बेंगलुरू का धनिया पत्ता यहां अपनी खुशबू बिखेर रहा है..इस बार 36 टन लीची इन शहरों में भेजी गई... कार्गो के जरिये यहां प्रति दिन तीन से चार टन धनिया आ रहा है...अगले साल से यहां का प्रसिद्ध मखाना, मछली और पान को देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजने की योजना है... राज्य में एविएशन सेक्टर में अपार संभावनाएं नज़र आ रही हैं... और आने वाले दिनों में मिथिलांचल के यात्रियों को भी बड़ी उम्मीदें हैं... 

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

मन और सेहत दोनों के लिए खास है मिथिला का मखाना (वर्ल्ड फूड डे पर विशेष)

 



वर्ल्ड फूड डे पर बात करते हैं विश्व प्रसिद्ध मखाना की...जो मिथिलांचल की पहचान है...मन को भाने वाले मखाना का मुरीद हर कोई है...देश के अलावा विदेशों में भी इसकी खासी डिमांड है...


सेहतमंद है मखाना

मखाना का खीर तो बनता ही है...साथ ही साथ इसको लोग घी में भूनकर भी खाते हैं...नाश्ते से से लेकर व्रत त्योहार तक में इसका उपयोग होता है...इसीलिए इसे सुपरफूड कहा जाता है...मखाना को डाइट में भी शामिल लोग करते हैं...ये सेहत और फिटनेस के लिए एक अच्छा आहार है... इसलिए न सिर्फ भारत में बल्कि दूसरे देशों में भी मखाना काफी अधिक प्रचलित है...मखाना की खेती बिहार के मधुबनी, दरभंगा, फारबिसगंज और पूर्णिया जिला में सबसे ज्यादा होती है...


मखाना के गुण के बारे में जानिए

मखाना कार्बोहायड्रेट, फाइबर, पौधा आधारित प्रोटीन और मैग्नीशियम, पोटेशियम, जिंक जैसे न्यूट्रिएंट का भी अच्छा साधन है... 

इसमें कोलेस्ट्रॉल, फैट और सोडियम की मात्रा कम होती है और इसलिए ये एक अच्छे स्नैक का विकल्प है...साथ ही, इनमें मैग्नीशियम की मात्रा ज्यादा होती है और सोडियम की कम...इसीलिए हाई ब्लड प्रेशर, मोटापे और दिल  से संबंधित परेशानियों से जूझ रहे लोगों को इसे अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए...मखाना का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और इसलिए डायबिटीज के मरीज भी डॉक्टर की सलाह पर मखाना या इससे बने उत्पाद अपनी डाइट में ले सकते हैं...इसमें एक ‘एंटी एजिंग एंजाइम’ भी होता है, जो ख़राब प्रोटीन को सही करने में मदद करता है...मखाना ग्लूटन-फ्री होता है...और इसमें प्रोटीन और फाइबर की ज्यादा मात्रा होती है...मखाना में कैलरी भी कम होती है और इसीलिए वजन कम करने पर मेहनत कर रहे लोग भी इन्हें अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं... 


मखाना का पुराना है इतिहास

करीब 200 साल पहले से भारत में मखाना की खेती हो रही है...और तब से ही ये भारत में आयुर्वेद का हिस्सा है...भारतीय आयुर्वेद के अलावा, चीन में भी पारंपरिक औषधियां तैयार करने में सालों से इसका प्रयोग किया जा रहा है...


गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

माता उच्चैठ की प्रतिमा पर मूर्ख कालीदास ने पोत दी थी कालिख... उसके बाद कालिदास बने विद्धान (दुर्गापूजा विशेष)

 यूं तो मां दुर्गा की महिमा सब जानते हैं... लेकिन हर सिद्धपीठ की कहानी और भी रोचक है... तो आइये इसी कड़ी में बताते हैं बिहार के मधुबनी जिले के उच्चैठ में स्थित सिद्धपीठ माता उच्चैठ भगवती से जुड़ी कहानी... यही वो माता हैं जिनके आशीर्वाद से महामूर्ख कालिदास विद्धान कालीदास कहलाए...


कालीदास ने क्यों पोत दी माता उच्चैठ की प्रतिमा पर कालिख?


मान्यता है कि उच्चैठ मंदिर के पूरब दिशा में एक संस्कृत पाठशाला थी... मंदिर और पाठशाला के बीच एक विशाल नदी थी... मूर्ख कालिदास अपनी विदूषी पत्नी विद्दोतमा से तिरस्कृत होकर मां भगवती के शरण में उच्चैठ आ गए... और उस विद्यालय के आवासीय छात्रों के लिए खाना बनाने का काम करने लगे... विद्यालय के छात्र काली मंदिर में हर रोज शाम में दीप जलाते थे.. लेकिन एक बार जब नदी में भयंकर बाढ़ आई तो पानी के तेज बहाव के चलते छात्रों ने काली मंदिर जाने से मना कर दिया... छात्रों ने कालिदास को महामूर्ख जान उसे मंदिर में दीप जलाने का आदेश दिया। साथ ही, छात्रों ने मंदिर की कोई निशानी लाने को कहा, ताकि ये साबित हो सके कि वो मंदिर तक पहुंचा था... आदेश के बाद कालिदास दीप जलाने के लिए नदी के रास्ते किसी तरह मंदिर तक पहुंचे... दीप जला दिया और जब निशान छोड़ने की बात आई तो उन्होंने दीप की कालिख को हाथ पर लगाया और माता की प्रतिमा पर कालिख लेप दिया.. कहते हैं कि इस घटना से मां काली को कालिदास पर दया आ गई.. और मां ने प्रकट होकर कालिदास से वरदान मांगने को कहा.. कालिदास ने अपनी पत्नी से तिरस्कृत होने की कहानी मां काली को सुनाई... कालिदास की कहानी सुनकर भगवती काली द्रवित हो गईं और उन्होंने कलिदास को वरदान दिया कि वो उस रात जितनी भी पुस्तकों को स्पर्श कर देंगे वो उन्हें याद हो जाएगी... कालिदास आवसीय परिसर लौटे और सारे छात्रों की सभी किताबों को उलट पलट दिया.. इसके बाद कालिदास महामूर्ख से महान विद्वान कालिदास बन गए... इसके बाद उन्होंने अभिज्ञान शाकुंतलम, कुमार संभव, मेघदूत, रघुवंश महाकाव्य जैसी कालजयी रचनाएं की...


पाठशाला के अवशेष अभी हैं


उच्चैठ में आज भी वो नदी है... उस पाठशाला के अवशेष मंदिर के निकट मौजूद है... इतना ही नहीं, मंदिर परिसर में कालिदास के जीवन सम्बंधित चित्र अंकित हैं...


शिलाखंड पर बनी हैं देवी की मूर्ति

उच्चैठ भगवती की मूर्ति काले शिलाखंड पर स्थित है... यहां पर मैया का आसन कमल है... और सिर्फ कंधे तक का ही हिस्सा नजर आता है... सिर नहीं होने की वजह से इन्हें छिन्नमस्तिका भगवती के नाम से भी भक्त जानते हैं...


श्मसान में साधना और बलि की प्रथा

उच्चैठ भगवती मंदिर परिसर में ही एक श्मशान है... जहां पर तंत्र साधना की जाती है.. .साथ ही यहां पर मुराद पूरी होने पर भक्तों की ओर से बलि प्रदान की जाती है... कहा जाता है कि, बलिप्रदान के दौरान निकलने वाले रक्त पर मक्खी नहीं भिनभिनाती है... साथ ही पास का तालाब रक्त से लाल हो जाता है...


भगवान राम भी कर चुके हैं मां छिन्नमस्तिका का दर्शन

माना जाता है कि उच्चैठ में छिन्न मस्तिका मां दुर्गा स्वयं प्रादुर्भूत हैं और  मां की दरबार में हाजिरी लगाने वालों की हर इच्छा पूरी होती है... माता के इस अवतार को नवम रूप सिद्घिदात्री और कामना पूर्ति दुर्गा के रूप में भी लोग पूजते हैं... मान्यता है कि भगवान श्री राम भी जनकपुर की यात्रा के समय उच्चैठ भगवती के दर्शन किये थे...


ओलंपिक में भारत की आशाएं

हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिल...