रविवार, 28 फ़रवरी 2021

जान पर भारी 'जाम'

बिहार के वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यही लगता है कि शराबबंदी अपने लक्ष्य से भटक चुकी है. शराब तस्करी से जुड़े लोग इतने बेखौफ हो गए हैं कि, उन्हें कानून का जरा भी खौफ नहीं. बेखौफ माफिया छापेमारी पर जाने वाली पुलिस टीम पर हमला कर देते हैं. इस हमले में कई की जान जा चुकी है.

अप्रैल 2016 से बिहार में शराबबंदी लागू है. सीएम नीतीश कुमार ने सामाजिक कल्याण के मकसद से इसे राज्य में लागू किया. शांति से शादी ब्याह हो, किसी सामाजिक कार्यक्रम में हंगामा न हो, शराब के चलते किसी का घर नहीं उजड़े, कोई महिला प्रताड़ना की शिकार न हो. किसी मां की कोख शराब के चलते सूनी न हो और किसी बुजुर्ग का सहारा न छिने. इसी सब बातों को ध्यान में रखकर शराबबंदी कानून उन्होंने लागू किया लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यही लगता है कि, शराबबंदी अपने लक्ष्य से भटक चुकी है. शराब तस्करी से जुड़े लोग इतने बेखौफ हो गए हैं कि, उन्हें कानून का जरा भी खौफ नहीं. बेखौफ माफिया छापेमारी पर जाने वाली पुलिस टीम पर हमला कर देते हैं. इस हमले में कई की जान जा चुकी है तो कई जख्मी हो चुके हैं.


24 फरवरी 2021 को सीतामढ़ी में एक दारोगा को तस्करों ने मौत की आगोश में भेज दिया. इससे पहले 28 नवंबर 2017 को समस्तीपुर के सरायरंजन में शराब माफिया की फायरिंग में हवलदार अनिल कुमार शहीद हो गए. 15 दिसम्बर 2018 को भोजपुर में शराब तस्करों का पीछा करते गाड़ी टकराई और ASI दीनानाथ सिंह शहीद हो गए. 20 नवम्बर 2018 को बक्सर के डुमरांव में तस्करों ने पुलिस वाहन पर हमला किया जिसमें पुलिसकर्मी बाल-बाल बचे थे. 11 अक्टूबर 2019 को छपरा में शराब लेकर घुस रहे तस्करों ने पुलिस पर फायरिंग की. 16 जून 2020 को आरा के कौशिक दुलारपुर में पुलिस के हथियार छीने और चंगुल में कैद तस्करों को छुड़ाया. 30 सितंबर 2020 को पटना के जक्कनपुर में तस्करों ने ASI पर हमला किया...10 दिसंबर 2020 को मधुबनी में रहिका के सतलखा गांव में छापेमारी करने गई टीम पर हमला हुआ. 22 फरवरी 2021 को बेगूसराय के पोखरिया में छापेमारी करने गई पुलिस पर पथराव हुआ जिसमें कई खाकीधारी जख्मी हो गए.


जहरीली शराब से जा चुकी हैं सैकड़ों जान


शराब की लत बड़ी मुश्किल से छूटती है. शराबबंदी के बाद चोरी छिपे शराब बनाने का काम गांव मोहल्लों में शुरू हो गया. स्प्रिट का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा जिसके चलते जानें जा रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 15.5 प्रतिशत पुरुषों ने शराब पीने की बात स्वीकार की है. शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की खपत अधिक है. ग्रामीण क्षेत्रों में 15.8 प्रतिशत लोग शराब पीते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ये आंकड़ा 14 फीसदी है. गोपालगंज हो या मुजफ्फरपुर हर जिले में जहरीली शराब से लोगों की जान जा चुकी है.कड़े कानून का पालन नहीं


कानून में प्रावधान है कि अगर आप अपने घर या किसी परिसर में नशे की अनुमति देते हैं या फिर कोई कहीं नशे की हालत में पाया जाता है, किसी जगह शराब पीता है तो ऐसी स्थिति में पकड़े जाने पर कम से कम पांच वर्ष और अधिकतम सात साल की सजा होगी. इतना कठोर कानून के बावजूद बिहार में शराब की बिक्री धड़ल्ले से जारी है.


शराबबंदी लागू करवाने वाले सवालों के घेरे में


शराबबंदी को लागू हुए करीब पांच साल हो चुके हैं. सरकार ने शराबबंदी को लागू कराने का का जिम्मा पुलिस को दिया लेकिन उसी महकमे के कुछ लोग इसे फेल करने में लग गए हैं. यकीन करना मुश्किल होता है लेकिन ये सच है कि चंद पैसों के लिए कई पुलिस वाले शराब तस्करों से मिले हुए हैं. शराब की डोर टू डोर डिलिवरी और चोरी छिपे बेचने में उनका अहम योगदान है. कई थानों को तस्कर इसकेलिये बकायदा एक मोटी रकम का भुगतान करते हैं. कार्रवाई के नाम पर कुछ ठोस नहीं होता. 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

बंगला हो गया खाली

 नीतीश कुमार बहुत ज्यादा बोलते नहीं, करने में विश्वास रखते हैं. सियासी पिच पर ऐसे लोग बहुत कम हैं जो इस फॉर्मूले को अपनाते हैं. हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी पार्टी प्रमुख चिराग पासवान ने जेडीयू का बहुत नुकसान किया था. चिराग ने जिस तरह की पॉलिटिक्स की, उससे 42 सीटों पर जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा. हर जगह वजह चिराग पासवान बने. यहां तक कि जेडीयू से बड़े भाई का तमगा छिन गया. सीटों की संख्या कम हो गई. नीतीश कुमार का रुतबा पहले वाला नहीं रहा. वो धमक नहीं रही. सियासत में नीतीश ने ये दिन शायद ही कभी देखा होगा.


इतना सब कुछ हो गया बावजूद इसके वो चुप रहे. सियासी दांव चलने के लिए वक्त की ओर देखने लगे. संगठन को मजबूत करने में जुट गए. इसकी शुरुआत उन्होंने खुद अध्यक्ष पद छोड़कर की. आरसीपी को पार्टी को कमान दी, जो रणनीति बनाने में माहिर हैं. वक्त बीतता गया और देखते ही देखते उन्होंने ऐसे मास्टरस्ट्रोक पर काम किया, जिसने सबको हैरान कर दिया. और तो और चिराग के पैरों तले से जमीन खिसका दी. 208 एलजेपी नेताओं को अपने पाले में करके दिखा दिया कि सियासत में अभी भी वो चिराग के 'गुरु' हैं.


जेडीयू ने एलजेपी के बंगले में ऐसी सेंध लगाई कि एक झटके में ऊपर से नीचे तक खाली हो गया. तीर से बंगला को धराशायी कर दिया. चिराग खुद को पीएम मोदी का 'हनुमान' कहते थे. उस 'हनुमान' की पूरी सेना को नीतीश के अपने पाले में कर दिया. अब पासवान फैमिली के अलावा पार्टी में कोई दिख नहीं रहा. चुनाव में चिराग की क्या हालत हुई, वो किसी से छुपी नहीं रही. वो खुद अपनी जमीन गंवा बैठे हैं. सियासी पिच में चिराग के सामने घना अंधेरा है. ये अंधेरा बड़ा ही घना है क्योंकि राजनीति में संगठन के बिना कुछ नहीं होता.

ओलंपिक में भारत की आशाएं

हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिल...