
खून किसी का भी बहे,मौत किसी की भी हो,जख्म किसी के भी जिस्म पर उभरे,गम और दर्द का होना लाजिमी है। लेकिन दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं। जिन्हें खून बहाने,मौत का खेल खेलने और जख्म देने में मजा आता है। वैसे पत्थर दिल इंसानों के लिए ये मायने नहीं रखता कि,कौन अपना है और कौन पराया। उन्हें मतलब है तो सिर्फ और सिर्फ रक्तचरित्र करने से। जरा सोचिए...जब एक ही छत के नीचे दो ऐसे लोग मौजूद हों। जिनमें से एक को अमन चैन पसंद है तो दूसरे को तबाही। इतना ही नहीं अगर दोनों के बीच पति- पत्नी का रिश्ता हो तो ?। जाहिर सी बात है सामंजस बैठाना बड़ा ही मुश्किल होगा। इस हालात पर और कुछ कहूं उससे पहले थोड़ी देर के लिए अतीत में चलते हैं। दरअसल,अहमदाबाद पुलिस ने शहजाद रंगरेज नाम के एक ऐसे शख्स को गिरफ्तार किया। जो अपने घर में तबाही का सामान यानी बम बनाता था। पुलिस को शहजाद के घर से 8 देसी बम और कई कारतूस बरामद हुए। हैरानी की बात ये है कि,शहजाद के बारे में पुलिस को जानकारी देने वाली कोई और नहीं बल्कि उसकी बेगम रेशमा थी। जिसने पुलिस को फोन कर बताया कि,उसके घर में बम है। रेशमा मुंबई सीरियल ब्लास्ट के बाद लोगों की चीख पुकार सुन इस कदर टूट गई कि,उसने अपने शौहर की करतूतों को उजागर कर दिया। रेशमा को उसकी इस हिम्मत के लिए गुजरात सरकार ने सम्मानित भी किया है। सम्मान पाने के बाद उसने कहा कि,वो अपने पति को ऐसा करने से मना भी करती थी। लेकिन वो नहीं माना। यहां तक कि,शहजाद ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी। पर रेशमा ने उसकी परवाह नहीं की। वो कहती है "पति के जेल जाने का उसे ग़म है,लेकिन उसने पति के आतंकी मंसूबे को कामयाब नहीं होने दिए,इसकी खुशी है।" अब आते हैं हालात पर। रेशमा चाहती तो अपने पति के बारे में किसी को नहीं बताती। लेकिन उसके जमीर ने उसे इसकी इजाजत नहीं दी। उसने सुहाग के आगे घुटने नहीं टेके। हालात से समझौता नहीं किया। उसने एक शख्स का ख्याल नहीं किया। बल्कि उसने पूरे मुल्क के आवाम के लिए सोचा। आज भी ही वो अपने शौहर से अलग होकर अकेली है। पर वो जानती है कि,पूरा वतन उसके साथ है। हमारे बीच रेशमा ने एक साथ कई मिसाल बना दिए हैं। मसलन गलत को गलत कहने का और फैसला लेने का।








