शनिवार, 24 दिसंबर 2011

शहंशाह ए तरन्नुम

आज महान गायक मोहम्मद रफी साहब की जंयती है। रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 को हुआ था। साल 1940 से इस फनकार ने गायिकी की दुनिया में कदम रखा और 1980 तक करीब 26 हजार गीतों को अपनी आवाज दी। आज पूरा देश इस महान फनकार को याद कर रहा है। रफी साहब ने बॉलीवुड में हर तरह के गाने गाए। मदमस्त आवाज वाले इस फनकार को दुनिया मोहम्मद रफी और शहंशाह ए तरन्नुम  के नाम से जानती है। साल 1960 में रफी साहब को बेमिसाल गायिकी के लिए पहला फिल्म फेयर अवार्ड मिला। इसके बाद 1961 में दूसरा और फिल्म दोस्ती के लिए 1965 में तीसरा फिल्म फेयर अवार्ड मिला। फिर 1966 में फिल्म सूरज के लिए चौथा और 1968 में फिल्म ब्रह्मचारी के लिए पांचवा फिल्म फेयर अवार्ड मिला। ये महान कलाकार आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं। पर इनकी आवाज हमेशा हमारे बीच गूंजती रहेगी। शायद इसीलिए हम कहते हैं न फनकार तुझसा तेरे बाद आया,मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया। 

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

उधार की जिंदगी



13 दिसंबर 2001 का दिन हम कभी भूल नहीं सकते,क्योंकि ये वो काली तारीख है,जब पांच आतंकियों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर पर हमला किया और AK- 47 की गोलियों से हमारे सीने पर ऐसा जख्म दिया,जो आज तक ताजा है। हमले में हमने अपने 9 वीर सपूतों को खो दिया। शहीदों ने पांचों आतंकियों को मौत के घाट तो उतारा ही साथ ही साथ संसद भवन में उस वक्त मौजूद करीब दौ सौ से ज्यादा सांसदों को बचाया। पुलिस की तत्परता के चलते एक साल के भीतर ही हमले में शामिल एक मास्टर माइंड अफजल गुरू पकड़ा गया,लेकिन अफसोस की शहीदों ने जान की बाजी लगाकर जिन सांसदों को बचाया,वही सांसदों की जमात वोट बैंक के जाल में अफजल की फांसी को ऐसे उलझाया कि, फंदे की फाइल दिल्ली सरकार,गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति भवन की गलियों में भटक रहा है। ये तो थी हमले की कहानी,अब आते हैं असल मुद्दे पर,13 दिसंबर को टीवी खोला तो देखा कि,हमारे ज्यादातर सांसद संसद भवन परिसर में हमले में शहीद जाबांजों को श्रद्धांजलि दे रहे थे। पर श्रद्धांजलि देते वक्त मैंने देखा कि,सभी सांसद प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने का ढोंग कर रहे थे। उनके आव-भाव से नहीं लगा कि,उनके दिल में शहीदों के लिए कोई इज्जत है। एकाध सांसदों को छोड़ सभी सफेदपोश हंसकर पुष्प अर्पित कर रहे थे। उस दृश्य को देख मैं काफी गुस्से में आ गया। मुझे अफसोस हो रहा था कि,क्यों उन 9 घरों के चिरागों ने अपनी जान गंवाकर इन सफेदपोशों को बचाया। उन्होंने अपने फर्ज का निर्वहन तो अपनी अंतिम सांस तक किया,लेकिन हमारे नुमाइंदे तो उनकी शहादत को सलाम करने के लिए अपना फर्ज तक भूल गए। दुख होता है जब संसद हमले का जिक्र होता है। फक्र होता है वीर सपूतों की शहादत पर,लेकिन शर्म से उस वक्त पानी-पानी हो जाता हूं जब सफेदपोशों की बेहया वाली हरकतों को देखता हूं। आंखों में पानी भर आता है,जब टीवी चैनलों पर शहीदों की मां,विधवा और बच्चों की व्यथा सुनता हूं। 13 दिसंबर को एक टीवी चैनल पर एक शहीद की विधवा बता रही थी कि, सरकार की ओर से उन्हें पेट्रोल पंप देने का ऐलान किया गया। जब वो अपना हक लेने पहुंची तो उनसे रिश्वत मांगी गई। इन हालातों को देख सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि,वाकई सिस्टम इतना बेइमान और बेशर्म हो गया है। राहुल गांधी कहते हैं उन्हें यूपी की बदहाली देख गुस्सा आता है। लाल कृष्ण आडवाणी को पश्चिम मॉडल से नफरत है। ऐसे में इन दोनों को सांसदों का आचरण और अफजल गुरू को जेल में देख गुस्सा क्यों नहीं आता है,अगर इन मुद्दों पर इनका खून खौलता तो निश्चित तौर पर मैं कह सकता हूं कि,इनलोगों को गुस्सा वहीं आता है जहां वोट बैंक का मामला होता है। हमारे नुमाइंदे ये क्यों भूल जाते हैं कि,जिस जिंदगी को वो जी रहे हैं,वो उन शहीदों की देन है। कहा जाए तो वो सभी उधार की जिंदगी जी रहे हैं।

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

भंवरी का भंवरा

जिस तरह से क्रिकेट के खिलाडी़ के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। मेरा मानना है कि,ठीक उसी तरह सियासत में भी कुछ असंभव नहीं है। क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ी जिस तरह से कभी शतक लगा के वाहवाही लूट लेते हैं और कभी शून्य पर आउट होकर फजीहत करवा लेते हैं। उसी तरीके से अपने चरित्र की दुहाई देने वाले कुछेक सियासतदां ऐसा कर देते हैं जिससे वो तो परेशान होते ही हैं। साथ ही साथ सियासी गलियारों में भी भूचाल ला देते हैं। ताजा मामला राजस्थान से जुड़ा है। जहां पर भंवरी के भंवरजाल वाली सीडी ने इस कदर तूफान ला दिया कि,प्रदेश के साथ-साथ देश की सियासत भी हिल गई। जोधपुर की महत्वाकांक्षी नर्स भंवरी और गहलोत सरकार में मंत्री रहे महिपाल मदेरणा की सीडी जबतक लॉकर के अंदर थी। सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन ज्योंहि सीडी बाहर निकली। ऐसा बवाल मचा कि,मदेरणा की कांग्रेस से विदाई हो गई और राजस्थान सरकार को प्राश्यचित के रुप में पुनर्गठन का फैसला लेना पड़ा। इस सियासी हायतौबा से हम सबों को बहुत कुछ सबक लेना चाहिए। औरत हो या मर्द। उसे उतना ही महत्वाकांक्षी होना चाहिए। जितने में उसकी और समाज की सेहत खराब न हो। जोधपुर की नर्स भंवरी कुछ साल पहले तक एक साधारण महिला थी। लेकिन दुनिया की चकाचौंध में  कम पढ़ी लिखी भंवरी ने उसे शॉर्टकट से पाने की चाहत पाल ली। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने अपने जिस्म को जरिया बनाया  और सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते पहुंच गई सियासत के भंवरजाल में। जहां पर उसने और उपर तक के सफर को तय करने के लिए मदेरणा को अपना हमसफर बना लिया। इस खतरनाक सफर में एक को अपना सपना पूरा करना था तो दूसरे को जिस्म का इस्तेमाल करने की बुरी लत थी। कह सकते हैं कि,दोनों ने पाया कि,वो एक दूसरे का ख्वाब पूरा कर सकते हैं। भंवरी ने मदेरणा को भंवरा बनाया। भंवरा बनकर मदेरणा ने रस का भरपूर आनंद भी लिया।लेकिन कहते हैं न कि,भंवरे की आदत होती है हर फूल पर बैठने की। कुछ ऐसा ही हुआ मदेरणा के साथ भी। उसने भंवरी से दूरी बनाने की सोची। लेकिन महत्वाकांक्षी भंवरी उसके इरादे को भांप गई। उसने एक बार फिर से जिस्म के जाल में अपने भंवरे को फांसा और अपनी और उसकी रंगीन कहानी को कैद कर लिया एक सीडी में। जिसे वो तुरुप के पत्ते के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती थी। पर शायद उसे सियासत की ताकत का अंदाजा नहीं था। भंवरी के लिए वही सीडी मौत का भंवरजाल बन गई। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि,सियासत और हुस्न जब एक गाड़ी पर सवार हो तो एक्सीडेंट होने से कोई रोक नहीं सकता।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

जग को जीत चला गया मुसाफिर



(होठों से छू लो तुम...बन जाओ मीत मेरे,मेरा प्रीत अमर कर दो)...
जगजीत सिंह...आज भले ही ये महान फनकार हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनकी आवाज हमेशा कायनात में गूंजती रहेगी। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने कम ही वक्त में लोगों के दिल में ऐसी जगह बना ली। जो उनके जाने के बाद भी कायम है। जग को जीत कर वो हमेशा के लिए अलविदा कह गए।किसी ने लिखा है कि मुसाफिर है ये जिंदगी, एक दिन आना और फिर एक दिन जाना भी है सबको...। इस शख्सियत के चले जाने से गजल अपने आप को तन्हा महसूस कर रही है और कह रही है...चिट्ठी न कोई संदेश...

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

प्लीज...अब तो बख्श दो



गुजरात में 2002के दंगों के दौरान वे दंगाइयों से हाथ जोड़कर रहम मांग रहे थे। वे अब गुजरात पुलिस से आग्रह कर रहे हैं, ‘प्लीज! मेरी तस्वीर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दें।’
अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर को कुतुबुद्दीन अंसारी ने 9 जून को पत्र लिखा। यह अब प्रकाश में आया है। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘आज मैं अपने परिवार के साथ शांति से रह रहा हूं। यही नहीं, मेरे बच्चे भी अच्छे माहौल में रह रहे हैं। मुझे दुख होता है, जब मैं हाथ जोड़े हुए अपनी तस्वीर को अखबारों, वेबसाइटों और स्वयंसेवी संगठनों की रिपोर्टो के कवर पर देखता हूं। इसमें मेरी लाचारी नजर आती है। मैं आग्रह करता हूं कि प्लीज, मेरी तस्वीर के भविष्य में किसी भी तरह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। साथ ही, सभी जगहों से इसे हटा दिया जाए।’




अंसारी ने बताया, ‘दंगो के बाद मैं महाराष्ट्र के मालेगांव चला गया। उसके बाद सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस नाम एनजीओ की मदद से कोलकाता आ गया। यहां एक साल रहा। इसी दौरान मालूम हुआ कि मेरी तस्वीर को लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।’ उनके मुताबिक, ‘दंगा पीड़ित होने के बावजूद अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला। अहमदाबाद कलेक्टर को आवेदन दिया। वह खारिज हो गया। बताया गया कि आवेदन 2002 में ही दाखिल करना था।’
याद है वह घटना अंसारी ने पत्र में बताया कि जब दंगे शुरू हुए वह शहर के नरोदा इलाके में रहते थे। इलाके में दंगाइयों ने हमला कर दिया। वे भी फंस गए। जब वे उनसे रहम की गुजारिश कर रहे थे, किसी फोटोग्राफर ने तस्वीर खींच ली। बाद में पुलिस ने उन्हें बचाया।

क्रोध की आग में जलता समाज



रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता का शिकार हुई राजबाला अब इस दुनिया से रुखसत हो चुकी है। हरियाणा के सोनीपत में उसकी चिता की आग भले ही शांत हो गई है। लेकिन उसकी राख के भीतर अब भी कई सवाल कौंध रहे हैं। या यूं कहे कि,समाज,सरकार और सिस्टम से ये पूछ रहा है कि,क्या इसी हिंसात्मक समाज,सरकार और सिस्टम का सपना बापू ने देखा था। मैं सोचता हूं अच्छा हुआ बापू हमें अलविदा कह गए। अगर हमार बीच होते तो मौजूदा हालात को देख उनकी आंखों से आंसू छलक पड़ते। हिंसात्मक समाज के इस मौजूदा स्वरूप को देखकर बेचैन हो उठते। जिस तरीके से आज बात-बात पर लोगों को गुस्सा आ जाता है। जिस तरीके से लोग क्रोध की ज्वाला को खून बहाकर शांत करते हैं। जिस ढंग से लोग रिश्तों को शर्मसार कर रहे हैं। वो कतई एक सभ्य समाज का परिचय नहीं हो सकता। बीते चार जून को रामलीला मैदान में जिस तरीके से पुलिसवालों ने अपना फर्ज निभाया। उसे कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। ये सच है कि,भीड़ पर काबू पाने के लिए कभी-कभी लाठी चलाने की जरूरत आन पड़ती है। लेकिन उसके भी तरीके हैं। आज हमारे बीच के ज्यादातर खाकीधारी अपने फर्ज और तरीके को भूल चुके हैं। रामलीला मैदान में भी उस रात जितने भी पुलिसवाले मौजूद थे। उनमें से अधिकांश फर्ज और नियम-कायदों को भूलकर वर्दी के नशे में चूर थे। तभी तो उन्होंने राजबाला पर इस तरह लाठी से प्रहार किया कि,उसकी रीढ की हड्डी ही टूट गई और आखिरकार 26 सितंबर 2011 को वो दर्द से कराहती हुई इस जहां को अलविदा कह गई। सरकार और सिस्टम के गलत रवैये के चलते ही समाज की रक्षा के लिए वर्दी पहनने वाले पुलिसकर्मी दरिंदे का रुख अख्तियार करते जा रहे हैं। यूपी के चंदौली में भी 27 सितंबर को पुलिस की दरिंदगी का शिकार एक ट्रक चालक को होना पड़ा। चंदौली के नौबतपुर में पुलिसवालों को ये बात नागवार गुजरी कि, ट्रक चालक ने रिश्वत क्यों नहीं दिया। कानून के रखवाले इस कदर क्रोधित हो उठे कि,पीट पीटकर उसकी जान ले ली। फ्लैश बैक में जाएंगे तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। सिर्फ पुलिसवाले या सरकार में शामिल लोग ही अंहकार की आग में नहीं जल रहे। बल्कि समाज में भी ऐसे हजारों दास्तान मिल जाएंगे। मैं इस वक्त छत्तीसगढ़ में कार्यरत हूं। इसीलिए यहां की कुछ हिंसक वारदात के बारे में बता रहा हूं। यहां पर ज्यादातर खबरें ऐसी आती हैं। जिसमें कोई बाप अपने बेटे को महज इसलिए मार देता है ताकि उसे संपत्ति का बंटवारा न करना पड़े। कोई भतीजा अपने चाचा को कत्ल इसलिए कर देता है,क्योंकि उसे चाचा का डांटना पंसद नहीं था। कोई पति अपनी पत्नी को इसलिए जिंदा जला देता है,क्योंकि उसकी पत्नी उसे शराब छोड़ देने को कहती है। इतना ही नहीं कई ऐसी खबरें भी सामने आई हैं या आते रहती है जिसमें मामूली विवाद पर इंसान-इंसानियत को भूल हैवान बन जाता है। ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता जिस दिन इंसानियत का खून न होता हो। आखिर क्या हो गया है हमारे समाज को,जो बात-बात पर क्रोध की ज्वाला धधक उठती है। आखिर कब बंद होगा इंसानियत को शर्मसार करने का ये खेल ?...आखिर कब बुझेगी ये आग ?...आखिर कब ?...

चाल,चरित्र और चेहरा



हमारे देश में संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। लेकिन अफसोस कि,इस मंदिर में जनता के प्रतिनिधि के तौर पर विराजमान तथाकथित देवता जितने सफेद कपड़े पहनते हैं। उतने ही काले उनके विचार और मन हैं। 16 अगस्त 2011 से पहले ऐसा महसूस होता था कि, कुछेक सफेदपोश ही भ्रष्टाचार को खत्म नहीं होने देना चाहते। पर अन्ना के आंदोलन दौरान और बाद में ये अच्छे तरीक से समझ में आ गया कि,ये सारे के सारे हमाम में नंगे हैं। मेरे विचारों पर सबसे पहली मुहर कांग्रेस के युवा प्रवक्ता मनीष तिवारी ने लगाई। अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन का आगाज किया और महाशय मनीष तिवारी ने बडे़ ही बेशर्मी के साथ अन्ना जैसे बेदाग छवि वाले को भ्रष्टाचारी तो कहा ही, साथ ही उन्हें 'तुम' कहकर भी संबोधित कर दिया। इसके बाद पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय ने अन्ना को पागल कह दिया। फिर संसद में लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की बोलने की बारी आई। उनके बोलने के पहले मैं ऐसा सोच रहा था कि,वे जरूर कुछ अच्छा बोलेंगे। लेकिन उन्होंने मेरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। राहुल ने लोकसभा में हंगामें के बीच लिखा हुआ भाषण पढ़ दिया। बड़ा दुख हुआ जो शख्स एक मजबूत भारत का सपना देख रहा है। उसकी नींव इतनी खोखली होगी। कांग्रेसी नेताओं ने दिल तोड़ा तो आस भाजपा से लगा बैठा। लगा कि,भाजपा विश्वासघात नहीं करेगी। लेकिन जनलोकपाल के मुद्दे पर भाजपा ने भी अपना असली चेहरा दिखा दिया। पूरे संसद में उस दिन कोई ऐसा नहीं था जो खुलकर अन्ना के समर्थन में बोलता। इसके बाद जब अन्ना ने लोगों से अपने-अपने जनप्रतिनिधियों के आवास के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की अपील की। तो सांसद अजीबोगरीब स्थिति में आ गए और आनन-फानन में सबने एक स्वर में अन्ना के तीनों शर्तों पर सहमति की मुहर लगा दी। इस पूरे घटनाक्रम में कई बातें सामने आई। जिस पर सोचना लाजिमी है। अन्ना के आंदोलन के दौरान अभिनेता ओमपुरी ने हमारे सांसदों को नालायक,अपपढ़ और गंवार कहा। किरण बेदी ने बेहरुपिया कहा तो इन सबको मिर्ची लग गई। सांसदों ने इसे संसद का अवमानना करार दे दिया। शरद यादव ने तो लंबा-चौड़ा भाषण दे दिया। सच कड़वा होता है दोस्तों और इस कड़वाहट को पचा पाना इन सफेदपोशों के बस में नहीं। अवमानना शब्द के मायने शायद हमारे सांसदों को नहीं पता है। अगर होता तो शरद यादव जैसे अनुभवी नेता राष्ट्रपति को 'सफेद हाथी' और राज्यपाल को 'बूढ़ी गाय' नहीं कहते। लालू प्रसाद यादव लोकतंत्र के मंदिर में सोते नहीं। मनीष तिवारी,सुबोधकांत सहाय अन्ना को 'तुम' और 'पागल' नहीं कहते। कांग्रेस के बतौलेबाज महासचिव दिग्विजय सिंह अन्ना को भाषा पर नियंत्रण रखने की सीख नहीं देते। दिग्गी राजा को कौन बताए कि,अन्ना के पोशाक जितने सफेद हैं। उतनी ही साफ-सुथरी उनकी छवि है। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले दिग्गी अन्ना के चरित्र के आगे कहीं नहीं टिकते। हमारे जनप्रतिनिधि कहते हैं कि,उनकी चाल बिलकुल सटीक है। चरित्र बेदाग है और चेहरा कमल की पंखुरियों के सामान कोमल हैं। तो फिर उन्हें जनलोकपाल बिल से एतराज क्यों है। ऐसा तो नहीं कि,अन्ना का जनलोकपाल बिल उनकी चाल का राज खोल देगा। उनके बेदाग चरित्र के पीछे छिपे धब्बों को उजागर कर देगा और कमल की पंखुरियों के तले उन्होंने भ्रष्टाचार की जो परत तैयार की है। उसे कुरेद कर जनता के सामने रख देगा। अरे महोदयों,अपने चाल,चरित्र और चेहरा का ख्याल नहीं है तो कम से कम देश के चाल,चरित्र,चेहरा का मान तो रखिए। अंत में आप सबों के लिए बशीर बद्र की ये पंक्तियां 'सभी चार दिन की हैं ये चांदनी,ये रियासतें,ये वजारतें...मुझे उस फ़कीर की शाने दे,के ज़माना जिसकी मिसाल दे'।

रविवार, 21 अगस्त 2011

कब बड़े होंगे राहुल बाबा...?

साल 2004 में राहुल गांधी ने पूर्ण रूप से राजनीति में कदम रखा। ये वो वक्त था जब कांग्रेस उथल पुथल के दौर से जूझते हुए सत्ता में आई। राहुल के राजनीति में आने के बाद देश के एक बड़े तबके को उनमें बहुत सारी उम्मीदें और विजन दिखाई पड़ी। उनमें उम्मीद की किरण दिखाई देने के बहुत सारे कारण हैं। पहला तो ये कि वे स्वर्गीय राजीव गांधी, जो विजन के धनी माने जाते थे,के पुत्र हैं और दूसरा ये कि, उन्होंने सियासी मैदान पर कदम रखते ही भारत को समझने की शुरुआत कर दी।
आगाज उन्होंने दक्षिण में रहने वाली गरीब और विधवा महिला कलावती के घर से किया। इसके बाद वो कई गांवों का दौरा किये। गरीबों के घर रात बिताया,खाना खाया। उनके दुख-दर्द को समझने की कोशिश करते नजर आए। वे युवाओं से भी संपर्क करते रहे। उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किए। अब तक के पत्रकारिता में मैंने बहुत सारे भाषण राहुल गांधी के सुने हैं। वे जहां भी जाते हैं दो भारत की बात करते हैं। भ्रष्टाचार होने की बात कबूल करते हैं और विरासत में राजनीति मिलने की बात को सहज भाव से स्वीकार करते हैं। इन बातों पर गौर करें तो मेरी तरह आपको भी लग सकता है कि,राहुल में अपने पिता की तरह विजन है। लेकिन इसके दूसरे पहलू पर भी गौर कीजिए।
राहुल दो भारत की बात करते हैं। यानी अमीर भारत और गरीब भारत। राहुल कहते हैं उन्हें इस फासले को मिटाना है। पर क्या सिर्फ बातें करने से ये खाई पट जाएगी। या फिर गरीबों के घर सोने,खाना खाने या फिर उन्हें कंबल बांट देने से ? राहुल को ये बात जेहन में बिठाना ही होगा कि, गरीबों से मिलने,हमदर्दी जताने भर से कुछ पल के लिए गरीबों की हिम्मत तो बढ़ायी जा सकती है, लेकिन आजीवन इस दर्द को मिटाया नहीं जा सकता। उन्हें याद रखना होगा कि, उनकी दादी इंदिरा गांधी ने भी गरीबी मिटाओ का नारा दिया था। इस नारे की बदौलत वो सत्ता में आई भी। पर वो गरीबी को मिटाने में नाकामयाब रही। राहुल को अतीत से सबक लेनी चाहिए। सिर्फ बातें करने से गरीबी नहीं मिटेगी। इसके लिए फैसले लेने होंगे और उसे लागू करने के लिए ढृढ इच्छाशक्ति के साथ उन फैसलों पर अमल करना होगा। राहुल को याद रखना होगा कि, आज भी भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे पैदा होते ही कुपोषण का शिकार क्यों हो जाते हैं ? शहरी या ग्रामीण इलाकों के लोग भूखमरी का शिकार क्यों हो रहे हैं ? क्या कभी उन्होंने सोचा है कि,जिस कलावती से वो मिलने गए।
जिस कलावती पर उन्होंने लंबा-चौड़ा भाषण संसद में दिया। उसके परिजन क्यों खुदकुशी किए ? उन्होंने कभी सोचा है कि,जिस छत्तीसगढ़ में आकर वो गरीबों की सूरत और सिरत बदलने का भाषण दिये थे। उसी छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के कई इलाकों में लोग क्यों दशकों से भूख से जूझ रहे हैं ? पिछले सात सालों से उनकी सरकार या यूं कहें कि, वो खुद सत्ता में हैं तो फिर ऐसे में वो किसके इंतजार में बैठे हैं। वो पिछले कुछ दिनों से किसानों के मसीहा बनने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं(खासकर उत्तरप्रदेश में)। यूपी में कहीं भी कुछ होता है, वो उनसे मिलने बड़े ही नाटकीय अंदाज में पहुंच जाते हैं। धारा 144 लागू होने के बावजूद वो अपनी चौपाल लगाने और पदयात्रा करने से बाज नहीं आते। अलीगढ़ में उन्होंने किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए महापंचायत का आयोजन किया। लेकिन महापंचायत तब्दील हो गया चुनावी रैली में। किसानों का नेता बनने में कोई हर्ज नहीं है।
लेकिन राहुल गांधी को ये भी ख्याल रखना होगा कि,वे भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। इसलिए उन्हें किसी दायरे में नहीं सिमटना चाहिए। भ्रष्टाचार के बारे में राहुल गांधी के पिता ही कहते थे कि,आम आदमी को उसका वाजिब हक नहीं मिलता। राहुल भी अपने भाषण में विरासत में मिली ये लाइनें कई बार दोहराते नजर आए हैं। पर ताज्जुब की बात ये है कि, वे ये कोशिश करते नहीं दिखाई दे रहे कि,आखिर इस बंदरबांट पर कैसे लगाम लगाया जा सके। अगर सही मायने में राहुल भ्रष्टाचार का निदान चाहते हैं तो उन्हें आगे आना चाहिए। उन्हें उस 74 साल के बुजुर्ग अन्ना हजारे का साथ देना चाहिए जो इस दीमक को जड़ से मिटाने के लिए कमर कस चुके हैं।
मुझे समझ में नहीं आता कि,देश आंदोलन की दौर से गुजर रहा है और वो तमाशबीन बने हुए हैं। राहुल गांधी आप भारत को समझिए,लेकिन समझते-समझते इतना वक्त जाया न कर दीजिए कि,लोग ये समझने लगे कि,आप भी वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। आपको भी सियासी चाटूकारिता पसंद है। और आपके कथनी और करनी में फर्क है। राहुल बाबा देश बदल रहा है। धीरे से नहीं तेजी के साथ परिवर्तन जारी है। बदलाव की ये बयार ऐसी है, जिसमें आशा की किरण है।

एक बनता हुआ भारत आपके सामने है। जिसके कई सपने हैं। इनमें कई राजनीति की जमीन से उगते हैं,तो कई समाज से। इस भारत में बहुत सारे सपने हैं। अंत में एक पत्रकार होने के नाते मैं आपसे यही उम्मीद रखता हूं कि,आप इन मुद्दों पर खुलकर बोलेंगे। सपने को साकार करने के लिए कुछ करते दिखाई देंगे। अमीर और गरीब भारत के फासले को कम करने का वक्त आ चुका है। इसलिए विरासत में मिली राजनीति का इस्तेमाल कीजिए। कब तक समझते रहेंगे भारत को। राहुल बाबा वक्त की पुकार है

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

गलत तो गलत है


खून किसी का भी बहे,मौत किसी की भी हो,जख्म किसी के भी जिस्म पर उभरे,गम और दर्द का होना लाजिमी है। लेकिन दुनिया में ऐसे भी इंसान हैं। जिन्हें खून बहाने,मौत का खेल खेलने और जख्म देने में मजा आता है। वैसे पत्थर दिल इंसानों के लिए ये मायने नहीं रखता कि,कौन अपना है और कौन पराया। उन्हें मतलब है तो सिर्फ और सिर्फ रक्तचरित्र करने से। जरा सोचिए...जब एक ही छत के नीचे दो ऐसे लोग मौजूद हों। जिनमें से एक को अमन चैन पसंद है तो दूसरे को तबाही। इतना ही नहीं अगर दोनों के बीच पति- पत्नी का रिश्ता हो तो ?। जाहिर सी बात है सामंजस बैठाना बड़ा ही मुश्किल होगा। इस हालात पर और कुछ कहूं उससे पहले थोड़ी देर के लिए अतीत में चलते हैं। दरअसल,अहमदाबाद पुलिस ने शहजाद रंगरेज नाम के एक ऐसे शख्स को गिरफ्तार किया। जो अपने घर में तबाही का सामान यानी बम बनाता था। पुलिस को शहजाद के घर से 8 देसी बम और कई कारतूस बरामद हुए। हैरानी की बात ये है कि,शहजाद के बारे में पुलिस को जानकारी देने वाली कोई और नहीं बल्कि उसकी बेगम रेशमा थी। जिसने पुलिस को फोन कर बताया कि,उसके घर में बम है। रेशमा मुंबई सीरियल ब्लास्ट के बाद लोगों की चीख पुकार सुन इस कदर टूट गई कि,उसने अपने शौहर की करतूतों को उजागर कर दिया। रेशमा को उसकी इस हिम्मत के लिए गुजरात सरकार ने सम्मानित भी किया है। सम्मान पाने के बाद उसने कहा कि,वो अपने पति को ऐसा करने से मना भी करती थी। लेकिन वो नहीं माना। यहां तक कि,शहजाद ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी। पर रेशमा ने उसकी परवाह नहीं की। वो कहती है "पति के जेल जाने का उसे ग़म है,लेकिन उसने पति के आतंकी मंसूबे को कामयाब नहीं होने दिए,इसकी खुशी है।" अब आते हैं हालात पर। रेशमा चाहती तो अपने पति के बारे में किसी को नहीं बताती। लेकिन उसके जमीर ने उसे इसकी इजाजत नहीं दी। उसने सुहाग के आगे घुटने नहीं टेके। हालात से समझौता नहीं किया। उसने एक शख्स का ख्याल नहीं किया। बल्कि उसने पूरे मुल्क के आवाम के लिए सोचा। आज भी ही वो अपने शौहर से अलग होकर अकेली है। पर वो जानती है कि,पूरा वतन उसके साथ है। हमारे बीच रेशमा ने एक साथ कई मिसाल बना दिए हैं। मसलन गलत को गलत कहने का और फैसला लेने का।




शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

अशुभ है 13 तारीख



मुंबई के बारे में कहा जाता है कि,ये शहर कभी सोता नहीं है। जिंदगी यहां चौबीसों घंटे दौड़ती रहती है। शायद इसीलिए आतंकियों की गंदी निगाह इस शहर के अमन चैन को तबाह करने पर लगी रहती है।
आतंकियों ने कई बार इस शहर को निशाना बनाया है। खासकर 13 तारीख, इस शहर के लिए सबसे मनहूस तारीख साबित हुई है।आतंक के आकाओं ने 13 मार्च 2003 को ट्रेन में बम ब्लास्ट किया। जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई। इस तारीख को आज भी मुंबई वाले याद कर सहम जाते हैं। इसके बाद 13 मई 2008 को मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हुआ। जिसमें कई बेगुनाहों की मौत हो गई। इसके अलावा अगर देश के बाकी हिस्सों में भी धमाकों की तारीख को याद करें तो,13 को और भी कई वारदातें हुईं हैं। दिल्ली में 13 सितंबर 2008 को सिलसिलेवार धमाके हुए। जिसमें 24 लोगों की मौत हो गई और और सौ से ज्यादा लोग जख्मी हुए। महाराष्ट्र के पुणे में 13 मई 2010 को जर्मन बेकरी में हुए जोरदार ब्लास्ट में कई लोगों की सांसे रुक गई। देश के लोग जहां 13 तारीख को अपनी डायरी में काली स्याही से लिखने को मजबूर हैं। वहीं आतंकियों ने इस तारीख को लाल स्याही से दर्ज करने की कसम खा ली है।

शनिवार, 7 मई 2011

यादें



कब,कौन,कैसे कोई ज़िंदगी में आ जाता है। पता नहीं चलता। हां,उसका अहसास तब होता है।जब वो आपसे दूर जाता है। या फिर आप उससे दूर होते हो। इस बात का अंदाजा पहली बार तब लगा जब एक बहुत ही ख़ास दोस्त ने मुझसे किसी कारणवश नाता तोड़ लिया। साल २००६ का वाकया है ये। रात को ११ बजे फोन आया। जब मैं दफ्तर से लौटकर गुवाहाटी के एक होटल में खाना खा रहा था। उसके एक शब्द ने मेरे मुंह का निवाला छिन लिया। और अश्कों की धारा बदले में दे दिया। कुछ दिनों तक उदास रहा। फिर काम में अपने व्यस्त कर लिया।फिर एक दिन पापा के गुजर जाने का दुखद समाचार मिला.उससे आजतक नहीं उबार पाया हू.नौकरी करते करते हैदराबाद आया.यहाँ बहुत दोस्त बने.३ साल कैसे बीत गया पता नहीं चला.हा,मालूम तब हुआ जब जी न्यूज़ ज्वाइन करने के लिए रायपुर आने लगा.सब इस बात को लेकर खुश थे की नई जॉब मिल गई.पर सबको इस बात का दुःख था कीं हम सब बिचाद रहे है.सबके नयन से आसू बह रहे थे.ट्रेन चल पड़ी इस वादे के साथं की फिर मिलेंगे.पर कब ये कोई नहीं janta था.इस wakye ne mujhe इस बात का एहसास kara diya की dosti kya है.कब,कौन,कैसे कोई ज़िंदगी में आ जाता है। पता नहीं चलता। हां,उसका अहसास तब होता है।जब वो आपसे दूर जाता है। या फिर आप उससे दूर होते हो।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

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रवीश कुमार से बात (भाग-१)

ज़रूर सुने ....खासकर मीडिया से जुड़े साथी....

बुधवार, 9 मार्च 2011

राजनीति जो न कराए...




कहावत है."जंग और प्यार में सब जायज है".पर माफ़ कीजियेगा.इस कहावत में एक शब्द जोड़ने की हिमाकत कर रहा हू."जंग,प्यार और राजनीति में सब जायज है".आप सोचेगे ये गुस्ताखी आखिर क्यों कर रहा हू.७ फ़रवरी को दोपहर के वक़्त टी.वी.देख रहा था.अचानक एक ब्रेअकिंग न्यूज़ आई .खबर थी कि सी.वी.सी.थामस की नियुक्ति के मामले पर पीएम डॉ.मनमोहन सिंह सदन में गलती मान ली है.मन में थोडा सा अफ़सोस हुआ.फिर याद आया की मनमोहन सिंह को अब गलती मानने की आदत पड़ चुकी है.आखों के सामने सहज ही वो मंज़र घूम गया .जब पींएम ने कुछ दिनों पहले चुनिन्दा टी.वी.चैनल के संपादको को ७ रेसकोर्स बुलाया था.उस मौके पर जब एक संपादक ने उनसे सवाल किया कि.संचार घोटाले पर उनकी क्या राय है.तो उन्होंने सहज भाव से कहा कि."वो मुजरिम है पर जितना बताया जा रहा है उतना नहीं".वहां पर संपादको ने जो भी सवाल किये मनमोहन सिंह ने बड़ी ईमानदारी से उसका जवाब दिया.ज़रा सोचिये.अगर मनमोहन सिंह कि जगह कोई और होता तो क्या अपनी गलती मानता.और चलिए अगर गलती मान भी लेता.तो क्या.सीधे रास्ते से मानता.बिलकुल नहीं.बिना लाग लपेट के वो ऐसा नहीं करता.पर चूँकि मनमोहन सिंह न ही एक परीपक राजनेता है.और लोगो के जेहन में आज भी मनमोहन सिंह कि छवि एक खाटी अर्थशास्त्री की है.पर इस पोलिटिक्स ने उस खाटी शब्द को खाटी नहीं रहने दिया.बेईमानो के बीच आकर नीली पगड़ी और सफ़ेद लिबास पहनने वाले मनमोहन सिंह का जो हाल हो गया है.उससे तो यही कहा जा सकता है."राजनीति जो कराए"...

शनिवार, 5 मार्च 2011

मौत की "करुणा"



मुंबई एक ऐसा शहर जिसके बारे में कहा जाता है.वहां जिंदगी २४ घंटे सडकों पर दौड़ती है.२७ नवम्बर १९७३ को भी इस शहर में कुछ ऐसा ही मंज़र था.कोई घर जाने की सोच रहा था.तो कोई घर से दफ्तर जाने की.पर इन सबके बीच एक शख्स ऐसा भी था.जो किसी को एक ऐसी जिंदगी देने की सोच रहा था.जिससे की वो मौत की भीख मांगने को मजबूर हो जाय.उस शख्स ने अपनी गन्दी खवाहिश तो पूरी कर ली.पर वो बेचारी आज भी एक ऐसी जिंदगी जी रही है.जो मौत से भी बदतर है.३७ साल बीत चुके है इस वाकये को.जब मुंबई के "के..एम अस्पताल "में कम करने वाली नर्स अरुणा शानबाग के साथ इसी अस्पताल में कम करने वाला एक सफाई कर्मी सोहनलाल बाल्मीकि ने इस तरह बलात्कार किया कि आज वो कोमा में है.हर दिन कि तरह उस दिन भी करुणा अपने घर से दफ्तर के लिए चेहरे पर मुस्कान लिए चली.अस्पताल पहुची.दिन भर मरीजो की सेवा की.फिर शाम ढलने पर अस्पताल के बेसमेंट में कपडे बदलने गई.अरुणा कपडे बदल ही रही थी कि दरिंदा सोहनलाल उसके पास आ धमका.और उसकी अस्मत को तार -तार कर दिया.अस्पताल के बेसमेंट में अरुणा की इज्ज़त लूट रही थी.और बेसमेंट के ऊपर मुंबई दौड़ रही थी.इस शोर शराबे और भाग दौड़ के बीच.जब तक लोग अरुणा के पास आते वो अपना सुध बुध खो चुकी थी.अरुणा अस्पताल गई.और कोमा में चली गई.इधर दरिंदा सोहनलाल महज सात सालो के लिए जेल गया.फिर छूट गया.और आज न्यू डेल्ही के निजी अस्पताल में अपनी बाकि की जिंदगी जी रहा है.पर अरुणा पिछले ३७ सालो से अस्पताल के उसी बिस्तर पर लेटी है.उसकी हालत ऐसी है कि वो करवट भी नहीं बदलती.सेवा में लगे लोगो को भी नहीं पहचानती.उसकी हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि.उसकी सेवा करने वाली एक पत्रकार पिंकी वीरानी ने सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए मौत मांगी है.२४ फ़रवरी को उस गुहार पर आखिरी सुनवाई हुई.और कोर्ट ने २४ फ़रवरी तक के लिए फैसला टाल दिया.इस बीच ये बहस छिड गई है कि .क्या अरुणा को मौत दे दी जाय?.इस पर समाज के एक तबके का कहना है कि ...नहीं...तो एक तबका कहता है कि ...हा...हर कोई इस बहस में फंसा हुआ दिखाई दे रहा है.कोई ये नहीं कहता नज़र आ रहा है कि.क्या न एक ऐसा कानून बने जो सोहनलाल जैसे दरिन्दे को सबक सिखाने के लिए काफी हो.मेरी नज़र में कानून को सोहनलाल को फिर से गिरफ्तार कर लेना चाहिए.और उसे ऐसी सजा मिले जिससे वो भी अरुणा कि तरह मौत मांगने को मजबूर हो जाय.खैर.फिर से आते है बदनसीब अरुणा पर.जिसे शायद ही मालूम हो कि.उसके ऊपर इस वक़्त देश में बहस छिड़ी हुई है.३ दशक पहले अरुणा भी मुस्कुराती थी.उसके मन में भी कुछ अरमान थे.कुछ ही दिनों बाद उसके हाथो में शादी कि मेहँदी लगने वाली थी.लेकिन सोहन लाल ने उसके अरमानो को इस तरह रौंदा कि आज वो किताबो के पन्नो में खो चुकी है.वो जिंदा तो है.लेकिन लाश बनकर.और उसके जिस्म से निकलने वाली हर साँस "मौत की करुणा" की भीख मांग रही है.आखिर क्यों ?.सोचना पड़ेगा...इस देश को...देश के सिस्टम को...और देश के कानून को...

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

बदरंग "हिना"




बहुत छोटा था जब फिल्म "हिना"देखने गया था . पहली दफा में कहानी तो समझ में नहीं आया.पर एक गीत जुबान पर ऐसे चढ़ा कि आज भी गुनगुनाते रहता हू.गाने का बोल है."मै हू खुशरंग हिना".बड़ा हुआ तो फिर से देखने गया.तब समझ में आया स्टोरी और हिना का मतलब."हिना" का अर्थ होता है -मेहँदी .जिसे हमारे घरों की औरते हाथो पर लगाती है.मेहँदी लगते वक़्त ठंडक देती है.और जब सूखने के बाद ख़ुश्बू के साथ चमक बिखेरती है.जिसे देख रूह को सुकून मिलता है.खैर एक बार फिर बात करते है फिल्म हिना की.फिल्म में हिना नाम की किरदार को एक ऐसे शख्स से प्यार हो जाता है जो अपनी यादास्त खो चुका है.और उसकी यादास्त तब वापस आती है.जब हिना के हाथो में उस शख्स के नाम की मेहँदी लग चुकी होती है.फिल्म में हिना अपनी नाम के मायनो को सही ठहराते हुए मेहँदी की खुश्बू को बदरंग कर देती है.तब से लेकर आज तक हिना और उसके मायने से अजीब सा लगाव हो गया है.कुछ दिनों पहले अखबारों में दो ऐसी ही हिना नाम की लड़की की कहानी पढ़ा.पढ़ने के बाद सोचने के लिए मजबूर हो गया कि.एक काल्पनिक हिना है जो खुद से बदरंग हुई.और एक वास्तविक हिना है.जिसे उसके अपनों ने ही बदरंग कर दिया.बंगलादेश की राजधानी ढाका से करीब ४० किलोमीटर दूर एक गाँव में १४ साल की लड़की का नाम उसके माँ-बाप ने बड़े ही प्यार से हिना रखा.हिना बचपन से ही अपने परिवार के लिए सोचती रहती थी.पर उसे क्या पता था कि.उसके ये इरादे उसके अपने ही बड़े भाई के हाथो काफूर हो जायेगे.हमेशा की तरह हिना उस दिन भी शौच के लिए बहार जा रही थी.उसी वक़्त उसका बड़ा भाई महबूब .जो हिना से उम्र में २६ साल बड़ा था.हिना को अपनी हवस का शिकार बना लिया.जब हिना ने विरोध किया तो महबूब की पत्नी ने १४ साल की गुडिया को समाज में बदचलन बना दिया.फिर तालिबानी पंचायत ने हिना को १०० बांस मारने का फरमान सुना दिया.और इस तरह माँ अकलीमा बेगम और पिता दर्बेश खान की आँखों के सामने हर बांस के वार के साथ हिना की चमक और खुश्बू फीकी होती चली गई.ठंडक,चमक और खुश्बू बिखेरने वाली हिना को समाज और उसके भाई ने इतना बदरंग कर दिया कि.वो हमेशा - हमेशा के लिए मौत कि आगोश में चली गई.और एक ऐसी कहानी बन गई.जो न जाने आने वाले कितने वक़्त तक समाज से ये सवाल करती रहेगी कि.आखिर हिना का कसूर क्या था ?.ताज्जुब की बात ये है कि.ये सबकुछ उस देश में हुआ जहाँ कोर्ट ने फतबे या इस्लामिक आदेश के नाम पर औरतो को दी जानेवाली चाबुक या डंडे की पिटाई की सजा को अपराध घोषित कर दिया था.इतना ही नहीं बंगलादेश में औरतो का पीछा करना भी अपराध है.बंगलादेश में फतबे से जुडी आकड़ो पर गौर फरमाएंगे तो रूह कांप उठेगी.बंगलादेश महिला परिषद् के आंकड़ो के मुताबिक २००२ में ३९ महिलाये मार दी गई.२००३ में ४४ औरते इसका शिकार हुई.२००४ में ५९,२००६ में ६६,२००७ में ७७,२००८ में २१ तो २००९ में ४८ महिलाओ की जीवनलीला तालिबानी फतबे के कारण खत्म हो गई.दूसरी एक और हिना की जिंदगी उसके अपनों ने ही उतरी इटली में खत्म कर दी.पाकिस्तानी मूल की २० साल की हिना के जिस्म पर २८ बार चाकू से सिर्फ इसलिए उसके पिता ने वार किया क्योकि हिना वेस्टर्न कपडे पहनने लगी थी.यहाँ बात सिर्फ बंगलादेश और इटली की हिना की नहीं.नज़र उठायेगे तो कई ऐसी हिना की कहानी आसपास मिल जाएगी.कहने को तो पूरी दुनिया में बेटी बचाओ का नारा दिया जाता है.लेकिन हिना की कहानी ऐसे नारों की ज़मीनी हकीकत पर पानी फेरने के लिए काफी है.बेटियों के साथ ऐसे वर्ताव के चलते ही शायद वाइस प्रेसिडेंट की पत्नी सलमा अंसारी कही होगी कि.बेटियों को पैदा होते मार देना चाहिए.सुधार के लिए मुहीम चलाना ज़रूरी है.पर उससे भी ज़रूरी है.लोगों कि सोच को बदलना.जो अपनी हवस को बुझाने और इज्ज़त की दुहाई देकर अपनों को भी रौंदने से नहीं चुकते.एक कारगर पहल की दरकार है जिससे की आगे से कोई हिना बदरंग न हो.फ़िलहाल तो मुझे बशीर बद्र साहब की ये कुछ पंतिया याद आ रही है."ये पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी,जो हाथों पर रची मेहँदी छुड़ाकर ले जाय".

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

हुजूर मत आइये आप वरना...



मैंने कहा न तुम मत आओ.देखो अभी भी वक़्त है रुक जाओ.तुम जहाँ हो वही ठीक हो.तुम जानते नहीं हो कि यहाँ तुम्हारे स्वागत के लिए फिर से कुछ तथाकथिक संस्कृति के ठेकेदार. लाठिया लेकर तैयार है.पार्को में अभी से चार पांच लोगो की टोली सिर पर. लाल कपड़ा बांधकर भवरे की तरह मंडराने लगे है.देखो पिछले बार की कहानी से में टूट चूका हू .तुम्हे याद है न किस तरह लोग तुम्हारे आने की ख़ुशी में पलक पवारे बिछाये थे.और कैसे तथाकथित ठेकेदारों ने उसपर पानी फेर दिया.देखो हम नहीं चाहते कि तुम्हारे चक्कर में ऐसे लोगो का दिल टूटे जो तुम्हारे आने का सालो से इंतजार करते है.एक सपना संजो के रखते है कि. तुम्हारे सामने लाल गुलाब के ज़रिये अपनी दिल की बात अपने चाहनेवालो को कहेंगे.जिनकी याद में वो सुबहो शाम खोये रहते है.हम जानते है कि वो पल क्या होता है और सिर्फ हम ही नहीं ऐसे सभी लोग जानते है. प्यार के उस दिन की महता.पर क्या करू यार जब तेल में डुबोये उन लाठियों और उसे हाथो में थमने वाले उन बदमाशो को देखता हू तो सोचने पर मजबूर हो जाता हू कि आखिर क्यों संस्कृति कि याद उन तथाकथित ठेकेदारों प्रेम दिवस के दिन ही आती है.कौन उन्हें समझाए कि जिस भगवन कि वो दुहाई देते है उन्हें भी प्यार पसंद है.कही ऐसे तो नहीं की ये सब वे टेलीविजन पर दिखने के लिए करते है ?.कौन उन्हें समझाए कि नफरत की आग को प्यार के पानी से ही बुझाया जा सकता है.देखो वे लोग इस बात को समझेगे कि नहीं ये तो मुझे नहीं पता पर तुम तो मेरी बात समझ सकते हो.तुम मत आओ.और अगर आना ही है तो कह दो डंके कि चोट पर कि जब जब प्यार पर पहरा हुआ है,प्यार और भी गहरा हुआ है,होता रहेगा.....अंत में सभी प्रेम दीवानों को मेरे तरफ से प्रेम दिवस की हार्दिक बधाई....

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

सुन्दर अति सुन्दर





"जब तक सांस चलेगी.कागज पर मिथिला पेंटिंग को उकेरती रहूगी".ये कहना है उस महान मिथिला की बेटी की जो अब दादी बन चुकी है.नाम है महासुंदरी देवी.इन्होने अपना पूरा जीवन इस कला के नाम कर दिया है.और भारत सरकार ने उनकी कला का सम्मान कर इस बार "पदम् श्री" से नवाज़ा है.बिहार में मधुबनी जिले के रांटी गाँव की रहने वाली है महासुंदरी जी। इससे पहले इन्हें "१९७३ में बिहार राज्य शिल्पी अवार्ड,१९८० में शेरेस्ट अवार्ड,१९८२ में प्रेसिडेंट नेशनल अवार्ड,१९९६-९७ में नेशनल तुलसी अवार्ड, १९९७ में नेशनल मिथिला चित्रकला अवार्ड,२००८ में शिल्प गुरु अवार्ड,२००९ में बिहार कलाकार अवार्ड" मिल चुका है.


मधुबनी जिसका मतलब होता है "शहद का वन".और इस जिले की पहचान मिथिला पेंटिंग की वजह से पूरी दुनिया में है.मिथिला(उतर बिहार ) के गाँव की महिलाये पहले इस पेंटिंग को मूलत मिटटी की दीवार पर करती थी.लेकिन अब यह कपडे,हाथ के बने कागज़ और केनवास पर की जाने लगी है.कहते है कि इस पेंटिंग की शुरुआत रामायण कल में हुई थी.जब मिथिला के रजा जनक ने अपनी बेटी सीता और राम के विवाह के मौके पर ये पेंटिंग करवाई थी. शुरू में ये दो रूपों में बनाई जाती थी.अरिपन(अल्पना ) और कोहबर(भितिचित्र ).इसको बनाने में प्रकिर्तिक रंगों का इस्तेमाल होता है।

कभी मौका मिले तो ज़रूर रांटी गाँव जाइएगा.हर घर की बेटी मिथिला पेंटिंग करती दिख जाएगी.औए मेरी तरफ से केंद्र और बिहार सरकार से गुज़ारिश है कि .वहां के कलाकारों को सम्मान के साथ साथ आर्थिक सहायता भी दे ताकि आने वाले वक़्त में ये पेंटिंग इतिहास के पन्नो में ही देखने को न मिले.

अंत में यही कहूगा कि."सफलता विरासत में नहीं मिलती बल्कि इसे हासिल करना होता है.महान लोगो की यही खासियत होती है कि वे किसी भी इस्थिति में में परिस्थिति को खुद पर हावी नहीं होने देते है.और विजेता बनकर उभरते है".

सोमवार, 31 जनवरी 2011

बापू को नमन



आदरणीय बापू,
बापू तुम कहाँ हो?.हम तुम्हे अक्सर चौक चौराहों पर मूर्तियों के रूप में खड़े देखते है.लेकिन तुम से बात नहीं कर पाते.बापू तुम लौट क्यों नहीं आते.एक बार लौट आओ न बापू.सच कहता हु बापू.अब सहन नहीं होता.दिल कचोट कर रह जाता है.बहुत बात करनी है बापू तुमसे.एक दो नहीं हजारो ऐसी बातें है। जो सिर्फ और सिर्फ तुम ही समझ सकते हो.देखो न बापू तुम्हारे हिंदुस्तान की क्या हालत हो गई है.तुमने हमें कुटीर उधोग का मंत्र दिया था.बापू हम नहीं माने.आज पूरे देश में हाहाकार मचा है.बापू किससे कहू कि आज इंसान.इंसान पर विशवास नहीं कर पा रहा.तुमने पंचायती राज का सपना दिखाया था.लेकिन पंचायती राज के नाम पर आज जो लोग कुर्सी पर बैठे है उनका नाम लेते हुए भी शर्म आती है.बापू हम जानते है.तुम्हे दुःख होता होगा.बताओ न बापू हम क्या करे.हम वोट देने ज़रूर जाते है.लेकिन चेहरों के अलावा कभी कुछ बदलते आजतक नहीं देखा बापू.दरिया,समंदर ,धरती,आकाश.सभी तुम्हारा फिर से इंतजार कर रहे है.बापू तुम ये मत सोचना कि हम तुम्हे ३० जनवरी और २ अक्तूबर को याद करते है.यकीं मनो बापू.जब कभी राम का नाम लेकर हमारे पास कोई वोट मांगने आता है.तुम हमें याद आने लगते हो.जब कभी राम का नाम लेकर कोई सिरफिरा किसी लड़की ,किसी मासूम पर जुल्म ढाता है. तुम हमें याद आने लगते हो.क्या -क्या कहू बापू . तुमने हमे जीने का मंत्र सिखाया था.लेकिन हमारे गुरु अब पच्छिम वाले हो गए.उनकी बातो को जायदा वजन दी जाने लगी है बापू.हम जानते है बापू तुम लौटकर नहीं आ सकते.फिर भी सोचता हु बापू.तुम जहाँ हो वही ठीक हो.आज का हिंदुस्तान अब तुम्हारे रहने लायक नहीं रह गया है.किस किस को समझाओगे तुम.कौन तुम्हारी सुनेगा.अब बस बापू .इतना ही कहना चाहता हू कि काश तुम लौट पाते ?....

रविवार, 23 जनवरी 2011

एक कोशिश तो कीजिये...



बिहार के मधुबनी जिले की पहचान आमतौर पर मिथिला पेंटिंग के साथ माछ(फिश ),पान और माखन से है.पर इस जिले की एक और खासियत है.यहाँ के लोग कोशिश करने से कभी पीछे नहीं हटते.हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी ब्लॉग के ज़रिये बता रहे है.फोटो में जो शख्स रिक्शा के पास खड़ा है.वो मधुबनी जिले के झंझारपुर का रहने वाला मजलूम नदाफ है.कुछ दिनों पहले तक इनकी जिन्द्गगी में खुशिया नहीं के बराबर थी.बार-बार सरकारी दफ्तर का चक्कर काटने के बाद भी नदाफ को इंदिरा आवास नहीं मिल रहा था.लेकिन साल २००६ में नदाफ ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया.और महज दस दिनों के अन्दर बिना रिश्वत दिए इन्हें इंदिरा आवास मिल गया.तभी से नदाफ ने ये बीड़ा उठाया कि.वो सभी को सूचना के अधिकार के बारे में बताएगा.ताकि दूसरे लोगो को भी इसका लाभ मिल सके.वही नदाफ की इस उपलब्धि से आसपास के लोग खासे प्रभावित है.और नदाफ की सराहना करते नहीं थकते.नदाफ की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि .सूचना के अधिकार के इस तरह से इस्तेमाल के लिए उसे "बेस्ट सिटिजनशिप अवार्ड" से नवाजा गया .अनपढ़ नदाफ भले इस सम्मान की भव्यता से वाकिफ न हो.लेकिन उसकी ये पहल ज़रूर काबिले तारीफ है.याद रखियेगा.कोशिशे हमेशा कामयाब होती है.

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

हमें तुम पर नाज़ है



अगर हौसला बुलंद हो.तो सारी अरचने अपने आप खत्म हो जाती है.अगर दिल में कुछ करने की हसरत हो.तो खुदा भी आपके साथ होता है.कुछ ऐसा ही हुआ बिहार के गया के इस सपूत अमित विशवकर्मा के साथ.गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाला ये पूत शारीरिक रूप से विकलांग है.पोलियो से पीड़ित है.वाबजूद इसके अमित अपने मन में पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनने का सपना संजोये हुए था.और आज उसे अपना सपना पूरा होते दिखाई दे रहा है.फ़िलहाल अमित आई .आई.टी.खड़गपुर में दाखिला ले चुका है.लेकिन इस मुकाम पर पहुचने से पहले उसे तमाम तरह की परेसनियो का सामना करना पड़ा.हम सब जानते है कि आई.आई.टी.की पढाई के लिए कितना पैसा होना चाहिए .पर अमित ने उसकी परवाह न करते हुए खुद से ही तैयारी करनी शुरू कर दी.दोस्तों से किताबे मांगकर .वो अपने सपने को पूरा करने में जुटा रहा.और आख़िरकार उसे सफलता मिल गई.उसका चयन आई.आई.टी.खड़गपुर में हुआ.पर उसे यहाँ भी आर्थिक सहायता की ज़रूरत थी.गरीबी का दंश झेलने वाला अमित और उसके पिता जीतेन्द्र कुछ पल के लिए ये सोचकर मायूस हो गए कि.इतना सारा पैसे वो कहाँ से लायेगे.और कौन क़र्ज़ देगा.पर कहते है न भगवन के घर देर है अंधेर नहीं.आई.आई.टी। में सलेक्ट होने के बाद पूरे इलाके में अमित का किस्सा लोग अपने बच्चो को सुनाने लगे.और एक दिन ये खुशखबरी गया के एस . एस.पी . अमित लोढ़ा के कानो तक पहुची.वे अमित से मिले.इस होनहार छात्र ने उन्हें अपनी समस्या बताई.फिर क्या था.एस.स.पी.और उनका विभाग अमित की मदद के लिए आगे आया.और उन्होंने अपने सहयोगियों की मदद से गरीब घर में जन्मे इस इंजीनियर को कम्युनिटी पुलिस के ज़रिये पढाई का सारा खर्च देने का जिम्मा ले लिया.पुलिस विभाग की इस पहल की तारीफ हर किसी ने की.अमित और उसके पिता के लिए तो हर पुलिस अधिकारी भगवान से कम नहीं है.अमित का जज्बा उन तमाम ऐसे लोगो के लिए मिसाल है.जो विकलांग होते हुए भी कुछ बनना चाहते है.क्योकि अमित ने बचपन से ही अपने जेहन में इस बात को बिठा लिया था कि "बदल सकती है तकदीरे,पलट सकती है तदबीरे,गर इंसा चाहे तो नई दुनिया खोज ही लेता है"अंत में अमित...हमें ही नहीं पूरी कायनात को तुम पर नाज़ है.

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

भिखारियों का गाँव



इसे विडंबना कह लीजिये या फिर हमारे सरकारों की लापरवाही कि. आज भी एक गाँव ऐसा है.जहाँ विकास की रोशनी की बाट वहां की जनता जोह रही है.जहाँ के बच्चे स्कूल इसलिए नहीं जाते क्योकि अगर वे स्कूल चले गए तो रात में भूखे सोना पड़ेगा,वहां के लोगो को आज भी प्यास बुझाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है.वहां के लोगो को आज भी तम्बुओ में रात गुजरने पड़ते है.गाँव की कहानी और बयां करें उससे पहले उसका नाम बता देते है.मध्य प्रदेश के कटनी की परेवागर गाँव की ये दास्ता है.इस गाँव में जितने भी परिवार है.सब भिखारी है.फकीर है.और कोई इनकी खबर लेने वाला नहीं है.गाँव की अनार बाई के मुताबिक चुनाव के वक़्त नेता इनसे हर समस्या से निजात दिलाने का वादा करते है.पर जीत जाने के बाद वादा भूल जाते है.तमाम तरह के असुविधा के बावजूद यहाँ के लोग खुश रहते है.गाँव में हर जाति के लोग रहते है.लेकिन उनके बीच मज़हब और अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं है.सबके घर में भीख मांगने के बाद ही चूल्हा जलता है.इनकी हालत सुन हम और आप भले ही दुखी हो.पर वहां के लोगो के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहता है.गाँव में विकास की रौशनी नहीं पहुची तो विकास की बात करना बेमानी लगता है.फिर भी गाँव का महबूब अपने घर में हर सुविधा रखे है.मसलन टी .वी.,मोबाईल,सी.डी. जब भी गाँव वाले एक साथ बैठते है.मनोरंजन का दौर चल पड़ता है.हालाकि गाँव की रंजीता कहती है कि.जो जिंदगी वो जी रही है.वैसी जिंदगी उसके बच्चे न जिए.पर अफ़सोस की संसाधन के आभाव में गाँव का हर बच्चा भीख मांगने को मजबूर है.सोनू ने बताया कि वो पढाई करना चाहता है.लेकिन अगर वो स्कूल जायेगा तो फिर रात को उसे भूखे सोना पड़ेगा.यानि सबके सब हालत के आगे बेबस है.ज़रा याद कीजिये जब मुंबई कि धारावी पर फिल्म सलाम्डोग मिलेनायर बनी थी.उस वक़्त हमारे नेताओ ने कैसे हल्ला मचाया था कि.फिल्म में भारत की गलत तस्वीर पेश की गई है.लेकिन इस गाँव के बारे में क्या कहेंगे हमारे सफेदपोश.धारावी में रहने वालो को बिजली तो नसीब होती है.पर यहाँ के लोगो को तो आज भी लालटेन युग में जीना पड़ रहा है.एक तरफ तो हम विकसित देश होने का सपना संजो रहे है.वही दूसरी ओर इस गाँव की कहानी उन सपनो को मुह चिढ़ा रही है.कोई बताएगा कि.विकसित हो जाने के पहले क्या परेवागर गाँव की सूरत और सिरत बदल जाएगी?.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

अतीत से सबक लेने का वक़्त



पूर्णिया के विधायक राज किशोर केसरी की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई होगी.उसकी हत्या करने वाली रूपम पाठक और उसकी माँ का गुस्सा अभी शांत भी नहीं हुआ कि उतर प्रदेश के बांदा से एक और विधायक का कारनामा सामने आ गया .बांदा की रहने वाली और दुष्कर्म की शिकार हुई नाबालिग युवती के मुताबिक बसपा के विधायक पुरषोत्तम नरेश दिवेदी ने उसके साथ दुष्कर्म किया.और पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस वाले उसे इन्साफ देने के बजाय जेल भेज दिया.हलाकि है हाईकोर्ट के आदेश के बाद युवती रिहा हो गई.पर रिहाई के बाद उसने अपने गुस्से का इजहार कुछ इस तरह किया."फांसी की सजा हो उसको.अब वो जेल से न निकलने पाय.और जो उसके आदमी है.उनको भी उसी तरह मारा कुटा जाय.जिस तरह मुझको मारा है.जेल में बंद करके सजा दी जाय .मुझे न्याय तभी मिल पायेगा.जब मेरे साथ दुष्कर्म करने वाले विधायक को फांसी होगी.और कानून सजा नहीं दे पाया तो मैं उससे बदला लूंगी".इस बयान पर गौर करने के बाद इतिहास की याद आती है.जिस लड़की के साथ विधायक ने दुष्कर्म किया वो निषाद है.और ज़रा याद कीजिये दस्यु सुन्दरी फूलन देवी को.उसने भी दुष्कर्म के बाद बागी तेवर अपनाया था.उसके गुस्से के खौफ से हम सब वाकिफ है.इसीलिए ज़रूरी है.पीड़ित लकड़ी को न्याय मिलना.ताकि राज किशोर केसरी और पुरषोत्तम जैसे विधायक के हवस का शिकार कोई और न बन सके.और किसी युवती को हथियार उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े.वक़्त आ गया है.जब हम अतीत से सबक लेकर एक मिसाल कायम करें..

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

डांस के बदलते मायने



चूकि में बिहार का रहने वाला हू.इसीलिए शुरुआत करते है बिहार से ही.१९९९ में दरभंगा से इंटर करने के बाद आगे की पढाई करने के लिए पटना आया.कुछ दिनों बाद काफी सारे दोस्त बन गए.उन्ही लोगो से पता चला कि सोनपुर मेल में इसबार एक से बढ़कर एक थेयेटर आये है.कोई शोभा सम्राट थेयेटर का नाम ले रहा था तो कोई गुलाब विकास थेयेटर कि तारीफ कर रहा था.में सोच में पड़ गया क्योकि बचपन से सुनता आया था कि सोनपुर मेला पशुओं के लिया फेमस है.पर पटना आने के बाद पता चला कि पशुओ की जगह ले ली है थेयेतारों ने.मेरी उत्सुकता बढ़ी और में भी पंहुचा सोनपुर.पहले तो टिकट लेने में मारामारी करनी पड़ी.और जब टिकट मिल गया तो अन्दर जाने के बाद पता चला की थेयेटर में क्या होता है.और टिकट काउंटर पर क्या अफरा तफरी थी.खैर यकीन मानिये पहली बार देखा और जाना भी की अश्लील डांस क्या होता है.उसके बाद मेरे मन में ये धारना बन गई कि अश्लील डांस सिर्फ और सिर्फ ठेयेतरो में ही होते है.पर ये मिथक कुछ ही दिनों बाद टूट गया.पटना से निकलने के बाद पता चला कि अश्लील डांस सिर्फ फ़िल्मी परदे और ठेयेतरो के पंडालो तक ही सिमित नहीं है.मेरा अगला पड़ाव डेल्ही था .वहां एक दोस्त के साथ जागरण में जाने का मौका मिला.पर वहां भक्ति संगीत की धुन के बजाय लोग अश्लील फ़िल्मी गीत के धुन पर जयादा थिरक रहे थे.भोपाल में भी यही नज़ारा दिखा.वक़्त के साथ फेहरिस्त इतनी लम्बी हो गई है कि बहुत उदाहरण याद भी नहीं.इसीलिए आते है सीधे मुद्दे पर । बॉलीवुड का आइटम सोंग(मुन्नी बदनाम हुई/Sheela की जवानी ) हो.या दोअर्थी भोजपुरी आइटम सोंग (करेंट mare ली / तोहर लहगा उठा देब रिमोट से) हर आयोजन में सुनने को मिल जायेगे और दिखेगे इसकी धुन पर थिरकती बार बलाए .आलम ये है कि कोई नेता चुनाव जीतता है तो जश्न अश्लील ठुमके से होता है.कोई अधिकारी रिटायर होता है तो उसकी बिदाई मुन्नी बदनाम हुई/Sheela की जवानी से होती है.मेरी समझ से पहले अश्लील डांस का चलन बिहार - उत्तर प्रदेश तक ही था.पर अब तो हर स्टेट में इसका चलन हो गया है.छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों पहले एक शहीद को अश्लील गीतों के जरिये याद किया गया.और बार बालाओ के डांस हुआ.ज़रा सोचिये क्या थे हम और क्या हो गए.

स्वागतम 2011




वक़्त कभी रुकता नहीं.वो चलता आया है.और चलता रहेगा.इसीलिए बेहतर यही होगा कि.हम और आप भी इसकी रफ़्तार से अपनी रफ़्तार मिला ले.माना की २१ वी सदी का पहला दशक काफी कड़वा अनुभव दे गया.पर ये भी सुच है कि आदमी समस्या और परेशानी झेलने के बाद ही सीखता है.क्योकि.अगर समस्या न हो गम का अहसास नहीं होगा.और गम का अहसास नहीं होगा तो ख़ुशी का अहसास नहीं होगा.तो समझदारी इसी में है कि । बीते हुए कल को आज में घोल दे.और आने वाले कल के लिए एक ऐसा माहोल तैयार करें जहाँ खुशिया ही खुशिया हो.गम और मायूसी की कोई जगह न हो.आइये २०११ का स्वागत करें.और अपने भविष्य के लिए नए सपने संजोये उसे पूरा करें.

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

एक ख़त सोनिया गाँधी के नाम




११ जनवरी २०११ को हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में सोनिया गाँधी का लेख पढ़ा .पढने के बाद मान में बहुत सारें सवाल उठाने लगे.उनके लेख में बहुत बात्तें ऐसी थी.जिसे आधार में शुरुआत कर सकता था.पर आगाज करता हु.उनकी ओर से लिखे गए रोहानी नीलकेनी के शब्दों से.अगर तेज़ दिमाग ,उदार हिरदय और धनवान एक साथ आ जाये तो एक बड़ा बदलाव आ सकता है.तो मैडम मेरा आपसे सवाल है की पिछले करीब एक दसक से आप और आपकी पार्टी उस कुर्शी पैर काबिज़ है.जहाँ से बदलाव की नई इबारत लिखी जा सकती है.आपके पास तेज़ दिमाग वालो की कमी नहीं है.जितना में आपके बारें में जनता हु.आप उदार हेरदय भी है.देश के धनवान लोगो से आपकी दोस्ती भी है.आप खुद भी उस फेहरिस्त में आती है.तो फिर क्यों नहीं कुछ नया दिखाई दे रहा है हिंदुस्तान में.मेरा दूसरा सवाल.सेवा से जुड़ा हुआ है.आपने अपने लेख में सेवा से जुड़े कई अहम् और बड़े लोगो के कोटेशन इस्तेमाल किये है.ये अच्छी बात है.पर सोनिया जी अभी कुछ दिनों पहले ही.जब डेल्ही में कड़ाके की सर्दी थी.और ठण्ड की ठिठुरन अपने पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ रही थी.उसी दरम्यान आपके निवास १० जनपथ के आगे मध्य प्रदेश के बेतुल से एक गरीब परिवार मदद की आस लेकर पंहुचा.उस दम्पति के साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे.बच्चो की माँ के दोनों हाथ कटे हुए थे.और उस परिवार का मुखिया बीमार था.करीब एक हफ्ते तक वो आपके निवास के आगे मदद की भीख दिन रात मांगते रहा.पर न तो आप उअस्से मिलना मुनासिब समझी .और न ही मदद करना.हा...आपने इतना ज़रूर कियाकि डेल्ही की मुखिया को आदेश देकर उस परिवार को किसी धरमशाला में भेज दिया.लाचार परिवार मीडिया के सामने मदद की भीख मागता रहा.पर आपकी ओर से उसे रेस्पोंसे नहीं मिला.अब आपको थोडा अतीत में ले जाना चाहता हु.याद कीजिये अपने सुपुत्र और देश के भावी परधानमंत्री राहुल गाँधी का महाराष्ट्र की रहने वाली कलावती पर दिया गया बयान.पर अफसोश की जिस क़र्ज़ की बोझ के चलते कलावती की मांग का सिंदूर मिट गया.उसी क़र्ज़ की असहनीय मार की वजह से उसकी बेटी भी बिधवा हो गई.शायद आप चाहती तो एक माँ के सामने उसकी जवान बेटी सफ़ेद साडी नहीं पहनती.और बेतुल से डेल्ही आई उस परिवार को धरंशाला नहीं जाने देती.आपही के मुताबिक सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों को देना है.देश की सबसे शक्तिशाली महिला के रूप में पहचान है आपकी.और इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए.कम से कम मुझे तो नहीं है.चूकी आपने लेख में गरीबी के आकडे को छुआ है.तो आपसे मेरा आपसे तीसरा सवाल है की.आपकी सास और देश की पहली महिला परधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा था की वे गरीबी को भारत से हटा के रहेंगी.वो अब इस दुनिया में नहीं है.पर उनके इस सपने को पूरा करने का आपके पास भरपूर मौका है.आप सत्ता में है.डॉक्टर मनमोहन सिंह आपकी सरकार के मुखिया है.योजना आयोग के वइस प्रेसिडेंट के तौर पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया है आपके पास .तो फिर क्या नहीं महगाई का दानव का दायरा सिकुड़ रहा है.कभी मौका मिले तो झुग्गी में रात बिताने वाले उन ९.३ करोड़ लोगो के बारें में सोचियेगा की क्या उनके घर सब्जी बनती होगी.क्या उनके बच्चे दूध पीते होंगे.और अगर दूध मिल भी गया तो उसमे डालने के लिए उन्हें चीनी मिलता होगा.उन १२.८ करोड़ लोगो के बर्रें में सोचियेगा.जिन्हें साफ़ पानी तक नसीब नहीं होता.देश के उन ७० लाख बच्चो के भविष्य के बर्रें में आपका क्या ख्याल है.जो गरीबी की चादर से इस कदर ढके है की शिक्षा की रौशनी का उन्हें पता ही नहीं.उन माता पिता का क्या.जिनके बच्चे कुपोषण की आज में झुलस रहे है.और धीरे धीरे मौत के करीब आतें जा रहें है.आपके मुताबिक हमारे देश में बहुतो के पास अकल्प्निये दौलत है .तो फिर कोई ऐसे उपाय कीजिये सोनिया गाँधी जी जो.आमिर इंडिया और गरीब भारत के बीच की खाई को पाट सके.हो सके तोकुछ पहल कीजियेगा...वरना...उपदेश तो देने के लिए ही होतें है............
राज किशोर झा
लेखक टी.वी.पत्रकार है.(ये उनके निजी विचार है.)

ओलंपिक में भारत की आशाएं

हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिल...