सोमवार, 30 अगस्त 2021

बिहार के गीतकार शैलेंद्र को क्यों कहा जाता था बागी ?

कैसे घोल दिया पूरब का रंग

रावलपिंडी में पला बढा इंसान अपने गीतों में पूरब का इतना बेजोड़ रंग इसलिए घोल सका...क्योंकि उनका संबध बिहार से था..शैलेंद्र के दादाजी यानी केसरीलाल का संबंध बिहार से था... बचपन के कुछ दिन मथुरा में गुजरा...अपने पुरखों की धरती बिहार की खुशबू से लबरेज शैलेंद्र की रावलपिंडी, मथुरा और बंबई की यायावरी ने ही तो उनके व्यक्तित्त्व में उर्दू हिंदी यानी गंगा जमुनी तहजीब की इतनी सम्मिलित मिठास भर दी...जो उनके गीतों के माध्यम से आज भी श्रोताओं को पूरबा बयार सी शीतलता प्रदान कर रही है...


शैलेंद्र एक बागी गीतकार थे

शैलेंद्र को  एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद करते हैं जिन्होंने गीत लेखन के तमाम प्रचलित मुहावरों से हटकर अपना एक अलग रंग जमाया... जिसमें लोक का रंग और सादापन सबकुछ था... हर कलाकार के अंदर एक बागी की आत्मा निवास करती है जो उसे रूढियों और प्रचलन के विरुद्ध जाने के लिए बाध्य करती है... शैलेंद्र भी सचमुच में एक बागी गीतकार थे


ठेठ हिंदी में गीत लेखन

थियेटर की कोख से नए-नए जन्मे हिंदी सिनेमा के लिए उस समय ठेठ हिंदी में गीत लेखन के बारे में सोचना भी दुश्वार था... उर्दू और फारसी के अल्फाजों के बगैर संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन और गीतलेखन की कतई गुंजाइश नहीं थी...शैलेंद्र ही अकेले हैं, जिनके गीतलेखन के क्षेत्र में भाषा और शिल्प को लेकर नए प्रयोग मिलते हैं... कुल मिलाकर कह सकते हैं शैलेंद्र पहले गीतकार हुए जिन्होंने गीत लेखन को आम जनों की जुबान में ढाला...


देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे... हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला...लेकिन आज तक इस गीतकार को कोई राजकीय पुरस्कार नहीं मिलना हैरान करता है.... 

सोमवार, 2 अगस्त 2021

मधुश्रावणी में बासी फूल से मां गौरी की पूजा

 मिथिलांचल में इन दिनों मधुश्रावणी पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. नवविवाहिता अपने पति की दीर्घायु होने के लिए मधुश्रावणी व्रत मनाती हैं. चौदह दिनों तक ये पूजा होती है. मधुश्रावणी में सुबह और दोपहर में कथा वाचन होता है. शादी के बाद पड़ने वाले पहले श्रावण कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि से शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक नाग देवता, गौरी, गणेश और महादेव की पूजा होती है. नवविवाहिता सज-संवरकर फूल चुनने बगिया में जाती है. इस दौरान नवविवाहिताओं की पूरी टोली होती है.

मधुश्रावणी में बासी फूल से मां गौरी की पूजा होती है. नवविवाहिता चौदह दिनों तक फूल की बगिया से फूल चुनती है. उसे डाली में सजाती है, फिर
अगले दिन बासी फूल से मां गौरी की आराधना की जाती है. पूजा के दौरान प्राचीनकाल की कथाएं सुनती हैं.

स्कन्द पुराण के मुताबिक नाग देवता और मां गौरी की पूजा करने वाली महिलाएं जीवनभर सुहागिन बनी रहती हैं. प्राचीन काल में कुरुप्रदेश के राजा को तपस्या से प्राप्त अल्पायु पुत्र चिरायु भी अपनी नवविवाहिता पत्नी मंगलागौरी की नाग पूजा से दीर्घायु होने में सफल रहा था. पुत्र के दीर्घायु होने से प्रसन्न राजा ने इसे राजकीय पूजा का स्थान दिया था. मिथिलांचल में इस पर्व का विशेष महत्व है.

ससुराल के सामान से होती है पूजा

मधुश्रावणी में चौदह दिनों तक सभी नवविवाहिताएं पूरी निष्ठा से बिना नमक के सात्विक भोजन करती हैं. इस दौरान ससुराल से आए अरबा चावल, घी, चना और फलों का सेवन करती हैं. इतना ही नहीं प्रसाद स्वरूप ससुराल से आए अंकुरित बदाम महिलाओं के बीच वितरण करने की परंपरा है. इसके पीछे जीवन को अंकुरित करने की सोच है. कहा जाता है कि विवाह के बाद स्त्रियों का अपने मायके से अधिकार सीमित हो जाते हैं, इसलिए इस अवधि में उनकी व्रत, पूजा और भोजन का सामान ससुराल आता है.


दीये की बाती से देती हैं अग्निपरीक्षा

मधुश्रावणी के अंतिम दिन नवविवाहिता की परीक्षा जलते अग्नि की टेमी (बाती) से की जाती है जिसमें सौभाग्य के प्रतीक उनके पति के उपस्थित होने की परंपरा है. मान्यता है कि पूर्ण पतिव्रता नारी के शरीर में स्पर्श होते ही आग शीतल हो जाती है और उसे कुछ नहीं होता. इसके बाद सुहागिनों से नवविवाहिता को आशीर्वाद मिलते हैं और कथावाचिका को श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा और विदाई दी जाती है.

ओलंपिक में भारत की आशाएं

हर 4 साल पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ओलंपिक आयोजित की जाती है...दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं..करीब 300 से ज्यादा गोल्ड मेडल के लिए खिल...