कैसे घोल दिया पूरब का रंग
रावलपिंडी में पला बढा इंसान अपने गीतों में पूरब का इतना बेजोड़ रंग इसलिए घोल सका...क्योंकि उनका संबध बिहार से था..शैलेंद्र के दादाजी यानी केसरीलाल का संबंध बिहार से था... बचपन के कुछ दिन मथुरा में गुजरा...अपने पुरखों की धरती बिहार की खुशबू से लबरेज शैलेंद्र की रावलपिंडी, मथुरा और बंबई की यायावरी ने ही तो उनके व्यक्तित्त्व में उर्दू हिंदी यानी गंगा जमुनी तहजीब की इतनी सम्मिलित मिठास भर दी...जो उनके गीतों के माध्यम से आज भी श्रोताओं को पूरबा बयार सी शीतलता प्रदान कर रही है...
शैलेंद्र एक बागी गीतकार थे
शैलेंद्र को एक ऐसे गीतकार के तौर पर याद करते हैं जिन्होंने गीत लेखन के तमाम प्रचलित मुहावरों से हटकर अपना एक अलग रंग जमाया... जिसमें लोक का रंग और सादापन सबकुछ था... हर कलाकार के अंदर एक बागी की आत्मा निवास करती है जो उसे रूढियों और प्रचलन के विरुद्ध जाने के लिए बाध्य करती है... शैलेंद्र भी सचमुच में एक बागी गीतकार थे
ठेठ हिंदी में गीत लेखन
थियेटर की कोख से नए-नए जन्मे हिंदी सिनेमा के लिए उस समय ठेठ हिंदी में गीत लेखन के बारे में सोचना भी दुश्वार था... उर्दू और फारसी के अल्फाजों के बगैर संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन और गीतलेखन की कतई गुंजाइश नहीं थी...शैलेंद्र ही अकेले हैं, जिनके गीतलेखन के क्षेत्र में भाषा और शिल्प को लेकर नए प्रयोग मिलते हैं... कुल मिलाकर कह सकते हैं शैलेंद्र पहले गीतकार हुए जिन्होंने गीत लेखन को आम जनों की जुबान में ढाला...
देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे... हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला...लेकिन आज तक इस गीतकार को कोई राजकीय पुरस्कार नहीं मिलना हैरान करता है....

