सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

सुन्दर अति सुन्दर





"जब तक सांस चलेगी.कागज पर मिथिला पेंटिंग को उकेरती रहूगी".ये कहना है उस महान मिथिला की बेटी की जो अब दादी बन चुकी है.नाम है महासुंदरी देवी.इन्होने अपना पूरा जीवन इस कला के नाम कर दिया है.और भारत सरकार ने उनकी कला का सम्मान कर इस बार "पदम् श्री" से नवाज़ा है.बिहार में मधुबनी जिले के रांटी गाँव की रहने वाली है महासुंदरी जी। इससे पहले इन्हें "१९७३ में बिहार राज्य शिल्पी अवार्ड,१९८० में शेरेस्ट अवार्ड,१९८२ में प्रेसिडेंट नेशनल अवार्ड,१९९६-९७ में नेशनल तुलसी अवार्ड, १९९७ में नेशनल मिथिला चित्रकला अवार्ड,२००८ में शिल्प गुरु अवार्ड,२००९ में बिहार कलाकार अवार्ड" मिल चुका है.


मधुबनी जिसका मतलब होता है "शहद का वन".और इस जिले की पहचान मिथिला पेंटिंग की वजह से पूरी दुनिया में है.मिथिला(उतर बिहार ) के गाँव की महिलाये पहले इस पेंटिंग को मूलत मिटटी की दीवार पर करती थी.लेकिन अब यह कपडे,हाथ के बने कागज़ और केनवास पर की जाने लगी है.कहते है कि इस पेंटिंग की शुरुआत रामायण कल में हुई थी.जब मिथिला के रजा जनक ने अपनी बेटी सीता और राम के विवाह के मौके पर ये पेंटिंग करवाई थी. शुरू में ये दो रूपों में बनाई जाती थी.अरिपन(अल्पना ) और कोहबर(भितिचित्र ).इसको बनाने में प्रकिर्तिक रंगों का इस्तेमाल होता है।

कभी मौका मिले तो ज़रूर रांटी गाँव जाइएगा.हर घर की बेटी मिथिला पेंटिंग करती दिख जाएगी.औए मेरी तरफ से केंद्र और बिहार सरकार से गुज़ारिश है कि .वहां के कलाकारों को सम्मान के साथ साथ आर्थिक सहायता भी दे ताकि आने वाले वक़्त में ये पेंटिंग इतिहास के पन्नो में ही देखने को न मिले.

अंत में यही कहूगा कि."सफलता विरासत में नहीं मिलती बल्कि इसे हासिल करना होता है.महान लोगो की यही खासियत होती है कि वे किसी भी इस्थिति में में परिस्थिति को खुद पर हावी नहीं होने देते है.और विजेता बनकर उभरते है".

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