मंगलवार, 11 जनवरी 2011

एक ख़त सोनिया गाँधी के नाम




११ जनवरी २०११ को हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में सोनिया गाँधी का लेख पढ़ा .पढने के बाद मान में बहुत सारें सवाल उठाने लगे.उनके लेख में बहुत बात्तें ऐसी थी.जिसे आधार में शुरुआत कर सकता था.पर आगाज करता हु.उनकी ओर से लिखे गए रोहानी नीलकेनी के शब्दों से.अगर तेज़ दिमाग ,उदार हिरदय और धनवान एक साथ आ जाये तो एक बड़ा बदलाव आ सकता है.तो मैडम मेरा आपसे सवाल है की पिछले करीब एक दसक से आप और आपकी पार्टी उस कुर्शी पैर काबिज़ है.जहाँ से बदलाव की नई इबारत लिखी जा सकती है.आपके पास तेज़ दिमाग वालो की कमी नहीं है.जितना में आपके बारें में जनता हु.आप उदार हेरदय भी है.देश के धनवान लोगो से आपकी दोस्ती भी है.आप खुद भी उस फेहरिस्त में आती है.तो फिर क्यों नहीं कुछ नया दिखाई दे रहा है हिंदुस्तान में.मेरा दूसरा सवाल.सेवा से जुड़ा हुआ है.आपने अपने लेख में सेवा से जुड़े कई अहम् और बड़े लोगो के कोटेशन इस्तेमाल किये है.ये अच्छी बात है.पर सोनिया जी अभी कुछ दिनों पहले ही.जब डेल्ही में कड़ाके की सर्दी थी.और ठण्ड की ठिठुरन अपने पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ रही थी.उसी दरम्यान आपके निवास १० जनपथ के आगे मध्य प्रदेश के बेतुल से एक गरीब परिवार मदद की आस लेकर पंहुचा.उस दम्पति के साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे.बच्चो की माँ के दोनों हाथ कटे हुए थे.और उस परिवार का मुखिया बीमार था.करीब एक हफ्ते तक वो आपके निवास के आगे मदद की भीख दिन रात मांगते रहा.पर न तो आप उअस्से मिलना मुनासिब समझी .और न ही मदद करना.हा...आपने इतना ज़रूर कियाकि डेल्ही की मुखिया को आदेश देकर उस परिवार को किसी धरमशाला में भेज दिया.लाचार परिवार मीडिया के सामने मदद की भीख मागता रहा.पर आपकी ओर से उसे रेस्पोंसे नहीं मिला.अब आपको थोडा अतीत में ले जाना चाहता हु.याद कीजिये अपने सुपुत्र और देश के भावी परधानमंत्री राहुल गाँधी का महाराष्ट्र की रहने वाली कलावती पर दिया गया बयान.पर अफसोश की जिस क़र्ज़ की बोझ के चलते कलावती की मांग का सिंदूर मिट गया.उसी क़र्ज़ की असहनीय मार की वजह से उसकी बेटी भी बिधवा हो गई.शायद आप चाहती तो एक माँ के सामने उसकी जवान बेटी सफ़ेद साडी नहीं पहनती.और बेतुल से डेल्ही आई उस परिवार को धरंशाला नहीं जाने देती.आपही के मुताबिक सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों को देना है.देश की सबसे शक्तिशाली महिला के रूप में पहचान है आपकी.और इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए.कम से कम मुझे तो नहीं है.चूकी आपने लेख में गरीबी के आकडे को छुआ है.तो आपसे मेरा आपसे तीसरा सवाल है की.आपकी सास और देश की पहली महिला परधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा था की वे गरीबी को भारत से हटा के रहेंगी.वो अब इस दुनिया में नहीं है.पर उनके इस सपने को पूरा करने का आपके पास भरपूर मौका है.आप सत्ता में है.डॉक्टर मनमोहन सिंह आपकी सरकार के मुखिया है.योजना आयोग के वइस प्रेसिडेंट के तौर पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया है आपके पास .तो फिर क्या नहीं महगाई का दानव का दायरा सिकुड़ रहा है.कभी मौका मिले तो झुग्गी में रात बिताने वाले उन ९.३ करोड़ लोगो के बारें में सोचियेगा की क्या उनके घर सब्जी बनती होगी.क्या उनके बच्चे दूध पीते होंगे.और अगर दूध मिल भी गया तो उसमे डालने के लिए उन्हें चीनी मिलता होगा.उन १२.८ करोड़ लोगो के बर्रें में सोचियेगा.जिन्हें साफ़ पानी तक नसीब नहीं होता.देश के उन ७० लाख बच्चो के भविष्य के बर्रें में आपका क्या ख्याल है.जो गरीबी की चादर से इस कदर ढके है की शिक्षा की रौशनी का उन्हें पता ही नहीं.उन माता पिता का क्या.जिनके बच्चे कुपोषण की आज में झुलस रहे है.और धीरे धीरे मौत के करीब आतें जा रहें है.आपके मुताबिक हमारे देश में बहुतो के पास अकल्प्निये दौलत है .तो फिर कोई ऐसे उपाय कीजिये सोनिया गाँधी जी जो.आमिर इंडिया और गरीब भारत के बीच की खाई को पाट सके.हो सके तोकुछ पहल कीजियेगा...वरना...उपदेश तो देने के लिए ही होतें है............
राज किशोर झा
लेखक टी.वी.पत्रकार है.(ये उनके निजी विचार है.)

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