उसकी सांस उखड़ रही थी,मैं बेचैन हो रहा था,बॉस कह रहा था,प्रोफाइल तैयार रखो,ब्रेकिंग हेडर तैयार रखो,अब तब की स्थिति थी,उधर आनंद आखिरी सफर की तैयारी में था,और इधर मैं दो रास्ते पर खड़ा था,मेरे कानों में वो कह रहा था,मैं फिर लौटूंगा इसी अंदाज में,और दूसरा यानी बॉस कह रहा था,जिंदगी रंगमंच है। मुझे पता नहीं चला कि,उस पल कौन सच्चा था,कौन झूठा? पर सच यही था कि, सबको कभी अलविदा न कहने वाला बाबर्ची खुद सबको आनंद देकर उस जहां में चला गया,जहां से लौटना नहीं होता। सिर्फ यादें ही याद रहती है। काका शब्द तो बचपन से सुनता आ रहा हूं,पर एक अनजाना काका इतना करीबी बन जाएगा,सोचा नहीं था। अलविदा आनंद।पर जाते-जाते तुमसे इतनी ही गुजारिश है " ऐ मेरे दोस्त लौट के आ जा,बिन तेरे जिंदगी अधूरी है"।
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